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सऊदी अरब में UNAOC सम्मेलन में भारत ने दोहराया ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदेश

सऊदी अरब की राजधानी रियाद में आयोजित संयुक्त राष्ट्र एलायंस ऑफ सिविलाइजेशन्स (UNAOC) के 11वें सम्मेलन में भारत ने आपसी सम्मान, संवाद और धार्मिक सौहार्द का संदेश दिया।

UNAOC समिट / X/@MEAIndia

भारत ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरा विश्व एक परिवार) और ‘सर्व धर्म समभाव’ के अपने सिद्धांतों को मजबूती से रखा है। सऊदी अरब की राजधानी रियाद में आयोजित संयुक्त राष्ट्र एलायंस ऑफ सिविलाइजेशन्स (UNAOC) के 11वें सम्मेलन में भारत ने आपसी सम्मान, संवाद और धार्मिक सौहार्द का संदेश दिया।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) पी. कुमारन ने इस सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। उन्होंने UNAOC के ‘ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स’ की उच्चस्तरीय बैठक में भारत का आधिकारिक बयान पेश किया।

भारत की सभ्यतागत सोच पर जोर
अपने संबोधन में पी. कुमारन ने कहा कि भारत एक प्राचीन सभ्यता और विविधताओं से भरा देश है, जहां अलग-अलग धर्म, संस्कृति और परंपराएं सदियों से साथ-साथ पनपती रही हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सोच वसुधैव कुटुंबकम और सर्व धर्म समभाव पर आधारित है, जो सभी धर्मों को समान सम्मान देती है।

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संवाद और समझ का मंच UNAOC
कुमारन ने UNAOC की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह मंच दुनिया भर में देशों और संस्कृतियों के बीच शांति, सद्भाव और आपसी समझ को बढ़ावा देता है, जो आज के तनावपूर्ण वैश्विक माहौल में बेहद जरूरी है।

कठिन दौर में हो रहा सम्मेलन
UNAOC की ओर से जारी बयान में कहा गया कि यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया गंभीर मतभेदों, कई जगह चल रहे संघर्षों और वैश्विक शासन व्यवस्था पर घटते भरोसे का सामना कर रही है।

14 और 15 दिसंबर को रियाद में आयोजित इस सम्मेलन में कई देशों के राजनीतिक नेता, अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय संगठनों के प्रतिनिधि, धार्मिक नेता और आस्था से जुड़े लोग, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज, शिक्षाविद, युवा, कला, खेल और मीडिया जगत के प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन का उद्देश्य संवाद और आपसी सम्मान के जरिए शांति और समझ को मजबूत करना है। यह सम्मेलन UNAOC की 20वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित किया गया। इसका मकसद बीते दो दशकों की उपलब्धियों की समीक्षा करना और भविष्य की दिशा तय करना है।

UNAOC की स्थापना वर्ष 2005 में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान की पहल पर हुई थी। इसे स्पेन और तुर्किये की सरकारों का समर्थन मिला था। इसका उद्देश्य समाजों और संस्कृतियों के बीच बढ़ते ध्रुवीकरण को समझना और उसे कम करने के लिए व्यावहारिक समाधान सुझाना था।

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