नूडल्स का हेल्दी विकल्प / IANS
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश में मिलेट्स यानी श्रीअन्न के उत्पादन और उपभोग को बढ़ावा दिए जाने की पहल का असर अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है। इसी कड़ी में बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर, भागलपुर के कृषि वैज्ञानिकों ने मिलेट्स आधारित एक नया और पौष्टिक उत्पाद विकसित किया है।
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने रागी और ज्वार से बने नूडल्स को 'न्यूट्री टिफिन बॉक्स' के रूप में लॉन्च किया है, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद लाभकारी बताया जा रहा है।
बीएयू के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने बताया कि इस उत्पाद को बाजार से जोड़ने के लिए राज्य सरकार से अपील की जाएगी, ताकि इसका प्रसार बिहार की जीविका दीदियों के माध्यम से किया जा सके।
उन्होंने कहा कि यदि इस न्यूट्री टिफिन बॉक्स को स्कूलों की मिड-डे मील योजना में शामिल किया जाए, तो बच्चों के पोषण स्तर में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है। रागी और ज्वार से बने नूडल्स न्यूट्रिशन और फाइबर से भरपूर हैं, जो न केवल बच्चों बल्कि बुजुर्गों और मरीजों के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकते हैं।
इसी मौके पर बीएयू के कुलपति ने खजूर से बने नीरा की बोतल भी प्रदर्शित की, जिसकी लॉन्चिंग हाल ही में बिहार के राज्यपाल के हाथों की गई है। उन्होंने बताया कि बिहार में एक करोड़ से अधिक ताड़ और खजूर के पेड़ मौजूद हैं और पासी समाज की आबादी भी 10 लाख से ज्यादा है। नीरा उत्पादन से जहां इस समाज को आजीविका का मजबूत आधार मिलेगा, वहीं नीरा की औषधीय विशेषताओं का लाभ उपभोक्ताओं को भी मिलेगा।
मीडिया से बातचीत में डॉ. डीआर सिंह ने मौजूदा खाद्य आदतों पर चिंता जताते हुए कहा कि आज बाजार में नूडल्स जैसे प्रोसेस्ड फूड की उपलब्धता बहुत अधिक है, जिनमें मैदे की मात्रा ज्यादा होती है, जबकि फाइबर और प्रोटीन की कमी रहती है। अधिकांश परिवार बच्चों को नाश्ते या लंच बॉक्स में ऐसे खाद्य पदार्थ देते हैं, जो उनके स्वास्थ्य के लिए सही नहीं हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक पिछले दो वर्षों से मिलेट्स से बने नूडल्स तैयार करने पर काम कर रहे थे और अब इसमें उन्हें सफलता मिली है।
उन्होंने बताया कि रागी और ज्वार से तैयार यह मिलेट्स नूडल्स 'न्यूट्री टिफिन बॉक्स' के नाम से जानी जाएगी। इसमें प्रोटीन और फाइबर की मात्रा अधिक है, साथ ही इसका रंग और स्वाद भी बेहतर है।
डॉ. सिंह ने कहा कि इस तकनीक को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए। यदि जीविका दीदियों को इससे जोड़ा जाए तो इसकी प्रभावी मार्केटिंग संभव है। साथ ही यदि इसे देशभर में स्कूलों की मिड-डे मील योजना में शामिल किया जाए, तो बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर होगा। उन्होंने बिहार सरकार से मांग की कि इस तकनीक को अपनाकर मिड-डे मील योजना से जोड़ा जाए, ताकि समाज के हर वर्ग को लाभ मिल सके।
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