सांकेतिक तस्वीर... / IANS
फरवरी में होने वाले चुनाव के बाद बांग्लादेश में बनने वाली नई सरकार के सामने भारत के साथ संबंधों को लेकर सबसे अहम मुद्दों में से एक फरक्का जल-बंटवारा संधि का नवीनीकरण होगा। यह संधि वर्ष 2026 में समाप्त हो रही है और इसमें स्वतः विस्तार का कोई प्रावधान नहीं है, ऐसे में दोनों देशों को नए सिरे से बातचीत करनी होगी।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में स्थित फरक्का बैराज दशकों से भारत-बांग्लादेश संबंधों का संवेदनशील केंद्र रहा है। इसका निर्माण मुख्य रूप से गंगा का पानी हुगली नदी में मोड़कर कोलकाता बंदरगाह की गाद हटाने और नौवहन क्षमता बढ़ाने के लिए किया गया था, लेकिन यह दक्षिण एशिया के सबसे जटिल सीमा-पार जल विवादों में से एक भी बन गया।
दिलचस्प बात यह है कि पहले के दोनों प्रमुख समझौते उस समय हुए थे, जब दोनों देशों में नई-नई सरकारें बनी थीं। पहला “फरक्का में गंगा जल बंटवारा समझौता” 7 नवंबर 1977 को ढाका में हुआ था। उससे कुछ ही महीने पहले भारत में मार्च 1977 में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे, जबकि अप्रैल 1977 में मेजर जनरल जियाउर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने थे।
दूसरा बड़ा समझौता 12 दिसंबर 1996 को हुआ, जब भारत के प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना दोनों ही अपने-अपने पदों पर मात्र छह महीने पहले ही आए थे। दोनों ने जून 1996 में कार्यभार संभाला था।
इस बार स्थिति अलग है। भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक स्थिर और मजबूत सरकार है, जबकि बांग्लादेश लगभग 17 महीनों की राजनीतिक अस्थिरता के बाद लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस वर्ष आपसी सहमति से संधि का नवीनीकरण होता है, उसमें कुछ सुधार किए जाते हैं, या फिर यदि ढाका ऐसे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के प्रभाव में आता है जो भारत को अस्थिर करना चाहते हैं, तो नई दिल्ली कड़ा रुख अपनाती है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, भारत अपने लोगों की सुरक्षा और देश की अखंडता की रक्षा के लिए कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। हाल ही में पाकिस्तान द्वारा सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन दिए जाने, जिसमें अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ घातक आतंकी हमला भी शामिल है, के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था। यह फैसला भारत की संप्रभुता की रक्षा के लिए उठाए गए व्यापक प्रतिकारात्मक कदमों का हिस्सा था, जिसमें सीमा पार आतंकी लॉन्चपैड्स पर सटीक हमले भी शामिल थे।
फरक्का बैराज की परिकल्पना 1950 के दशक में की गई थी और इसका निर्माण 1975 में पूरा हुआ। इसका उद्देश्य गंगा से अधिकतम 40,000 क्यूसेक पानी हुगली नदी में मोड़ना था, ताकि कोलकाता बंदरगाह में गाद जमने की समस्या को रोका जा सके। हालांकि, बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) को आशंका थी कि इससे शुष्क मौसम में पानी की कमी होगी, जिसका असर कृषि, मत्स्य पालन और नौवहन पर पड़ेगा।
अप्रैल 1975 में बैराज के संचालन के बाद, जब बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर चल रहा था, दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया। दीर्घकालिक समझौते के अभाव में 1970 और 1980 के दशकों में अस्थायी व्यवस्थाएं की गईं, लेकिन अविश्वास बना रहा।
1996 की संधि को एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया। इसने जनवरी से मई के बीच शुष्क मौसम के दौरान गंगा जल के बंटवारे के लिए 30 वर्षों का ढांचा प्रदान किया। फरक्का में 10-दिवसीय अवधि के जल प्रवाह के आधार पर व्यवस्था तय की गई, जिसमें कुछ परिस्थितियों में दोनों देशों को न्यूनतम 35,000 क्यूसेक पानी की गारंटी दी गई। इसके क्रियान्वयन की निगरानी एक संयुक्त समिति करती है, जो विवादों के समाधान की भी जिम्मेदार है।
हालांकि, संधि से तनाव कम हुआ, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियां बनी रहीं। जलवायु परिवर्तन, हिमनदों का पिघलना और भारत के राज्यों में बढ़ता जल उपयोग शुष्क मौसम में प्रवाह को कम कर रहे हैं। बांग्लादेश का आरोप रहा है कि उसे कई बार, खासकर सूखे वर्षों में, तय हिस्से से कम पानी मिलता है, जबकि भारत जलवैज्ञानिक सीमाओं का हवाला देता है।
पिछले एक दशक में भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, संपर्क और सुरक्षा सहयोग काफी बढ़ा है, लेकिन जल का मुद्दा बांग्लादेश में अब भी राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है। वहां की जनभावना में अक्सर भारत की अपस्ट्रीम परियोजनाओं को संदेह की नजर से देखा जाता है। इसके अलावा, एक दशक से अधिक समय से लंबित तीस्ता नदी विवाद ने भी धारणा को और जटिल बना दिया है। ऐसे में फरक्का संधि का नवीनीकरण दोनों देशों के बीच आपसी भरोसे की वास्तविक कसौटी साबित होगा।
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