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भारतीय सिनेमा के लिए खास '20 जनवरी', जब वीके मूर्ति और देवानंद को मिला खास सम्मान

वी. के. मूर्ति, जिन्होंने गुरुदत्त की फिल्मों जैसे 'प्यासा', 'कागज के फूल', और 'साहब बीवी और गुलाम' को कैमरे के जादू से जीवंत किया, और देवानंद हिंदी सिनेमा के सदाबहार अभिनेता थे।

देवानंद / AI

भारतीय सिनेमा में 20 जनवरी का दिन काफी खास रहा है, क्योंकि इस दिन कई बड़े कलाकारों और सिनेमैटोग्राफर्स के योगदान को याद किया जाता है। इसी दिन वी. के. मूर्ति और देवानंद जैसे दिग्गजों के जीवन और उपलब्धियों की चर्चा भी होती है। वी. के. मूर्ति, जिन्होंने गुरुदत्त की फिल्मों जैसे 'प्यासा', 'कागज के फूल', और 'साहब बीवी और गुलाम' को कैमरे के जादू से जीवंत किया, और देवानंद, जो हिंदी सिनेमा के सदाबहार अभिनेता थे, दोनों को इस दिन उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। 

वी. के. मूर्ति का असली नाम वेंकटराम पंडित कृष्णमूर्ति था। उनका जन्म 26 नवंबर 1923 को मैसूर में हुआ। बचपन से ही उनका झुकाव कला और संगीत की ओर था। उन्होंने स्कूल में वायलिन बजाना सीखा और बाद में बैंगलोर से सिनेमैटोग्राफी में डिप्लोमा प्राप्त किया। अपने युवा जीवन में मूर्ति स्वतंत्रता संग्राम में भी शामिल हुए और उन्हें जेल जाना पड़ा। इन अनुभवों ने उन्हें दृढ़ और अनुशासित बनाया।

मुंबई आने के बाद मूर्ति ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत देवानंद के कैमरामैन वी. रत्रा के सहायक के रूप में की। उनका टैलेंट जल्दी ही सामने आया। गुरु दत्त, जो उस समय फिल्म निर्देशन में नए थे, मूर्ति की तकनीक और कैमरे के साथ सहजता से प्रभावित हुए। इसके बाद 'जाल' (1952) में उन्हें मुख्य सिनेमैटोग्राफर बनाया गया। मूर्ति और गुरु दत्त का यह सहयोग बाद में लंबा और यादगार रहा।

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वी. के. मूर्ति को गुरुदत्त की फिल्मों के लिए हमेशा याद किया जाता है। उन्होंने 'प्यासा' में कवि विजय की गहरी भावनाओं को कैमरे में उतारा। 'कागज के फूल' में उन्होंने भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म को शूट किया और गीत 'वक्त ने किया क्या हसीन सितम…' के फिल्मांकन में अपनी तकनीक का कमाल दिखाया। 'साहब बीवी और गुलाम' में उन्होंने मीना कुमारी के किरदार की दुखभरी कहानी को बेहद प्रभावशाली तरीके से कैमरे में उतारा। इसके अलावा 'चौदहवीं का चांद', 'आर पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55', 'सी.आई.डी.', 'जिद्दी', और 'पाकीजा' जैसी कई फिल्मों में भी उन्होंने अपनी कला का जादू बिखेरा।

उनकी मेहनत और योगदान के लिए वी. के. मूर्ति को 2005 में इंटरनेशनल इंडियन फिल्म अकादमी (आईफा) का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला। इसके बाद, 20 जनवरी 2010 को उन्हें 2008 का प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया। खास बात यह थी कि यह पुरस्कार किसी सिनेमैटोग्राफर को पहली बार दिया गया।

वहीं, बॉलीवुड के सदाबहार अभिनेता देवानंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को लाहौर में हुआ। उनका असली नाम धरम पिशोरीमल आनंद था। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और मुंबई आकर मिलिट्री सेंसर कार्यालय में काम शुरू किया। 1946 में उनकी पहली फिल्म 'हम एक हैं' आई और 1948 में फिल्म 'जिद्दी' से पहली बड़ी सफलता मिली। इसके बाद उन्होंने 1960 की फिल्म 'गाइड' समेत कई यादगार फिल्मों में काम किया और भारतीय सिनेमा में अपनी खास पहचान बनाई।

देवानंद को उनके फिल्मी जीवन और योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्हें 20 जनवरी को एक कार्यक्रम में दिया गया। इस अवसर पर उनकी प्रमुख फिल्मों के अंश और उनके फिल्मी गीतों की झलकियां दिखाई गईं, जिससे दर्शकों को उनके छह दशक लंबे फिल्मी सफर की याद दिलाई गई।

वी. के. मूर्ति ने 7 अप्रैल 2014 को 91 वर्ष की आयु में बेंगलुरु में अंतिम सांस ली। वहीं, देवानंद का निधन दिल का दौरा पड़ने से 3 दिसंबर 2011 को 88 वर्ष की उम्र में हुआ।

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