सांकेतिक तस्वीर... / REUTERS/Hollie Adams
ऑस्ट्रेलिया का 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर लगाया गया प्रतिबंध सिर्फ एक राष्ट्रीय नीति भर नहीं है। यह एक वैश्विक चुनौती बन गया है। आधुनिक किशोरावस्था को परिभाषित करने वाले प्लेटफॉर्म से युवा-किशोरों को दूर करके, ऑस्ट्रेलिया ने उन लोकतंत्रों के सामने एक चुनौती खड़ी कर दी है जो इस दुविधा से जूझ रहे हैं कि आप अधिकारों और आजादी का दमन किए बिना मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा कैसे करते हैं?
स्वास्थ्य का तर्क दुनिया भर में जोर पकड़ रहा है। अमेरिका में, 2023 के सर्जन जनरल की एडवाइजरी ने चेतावनी दी थी कि सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल- दिन में तीन घंटे से अधिक- डिप्रेशन, एंग्जायटी, खराब नींद और यहां तक कि खुद को नुकसान पहुंचाने के जोखिम से जुड़ा है। किशोर खुद भी खतरे की घंटी बजा रहे हैं। 2025 के प्यू अध्ययन में पाया गया कि 48 फीसदी लोगों का मानना है कि सोशल मीडिया उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। इन नतीजों के बाद एप्स पर सिगरेट जैसे चेतावनी वाले लेबल लगाने की मांग उठी है। यानी एक ऐसी सिफारिश जिसके लिए सर्जन जनरल का कहना है कि अब कांग्रेस की कार्रवाई की जरूरत है। इस बीच, न्यूयॉर्क शहर ने तो बड़ी कंपनियों पर मुकदमा तक कर दिया है, उन्हें 'युवाओं के लिए खतरा' बताया है।
फिर भी, ऑस्ट्रेलिया दिखाता है कि आगे का रास्ता कितना मुश्किल है। बच्चों को नुकसान से बचाने के इरादे के बावजूद, इसे लागू करना पहले से ही जटिल मसला रहा है। टीनएजर्स VPN, दूसरे एप्स और गेमिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके बैन को चकमा दे रहे हैं और एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि उम्र की कड़ी पड़ताल या सत्यापन का मतलब है ज्यादा डेटा इकट्ठा करना। ID अपलोड, बायोमेट्रिक्स और ऐसे सिस्टम जो पूरी पीढ़ी के लिए निगरानी को नॉर्मल बना सकते हैं। और जब 17 साल की उम्र में बैन खत्म होता है, तो प्लेटफॉर्म अपने आप सुरक्षित नहीं रह जाते। अंदरूनी मुद्दे- ऐसे एल्गोरिदम जो गुस्से को बढ़ावा देते हैं, परफॉर्मेंस का दबाव, और लत लगाने के लिए बनाया गया अंतहीन स्क्रॉल- उम्र के साथ खत्म नहीं होते।
अमेरिका जैसे देशों के लिए, इसके नतीजे बहुत गहरे हैं। कई राज्यों ने अपने खुद के प्रतिबंध लगाने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें संवैधानिक रुकावटों का सामना करना पड़ा है। ऑस्ट्रेलिया के इस कदम से सख्त सुरक्षा चाहने वालों को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन यह मुख्य सवाल को भी उभार देता है कि क्या लोकतंत्र बिना बोलने की आजादी और निजी पसंद को कमजोर किए डिजिटल नुकसान को रोक सकते हैं?
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