प्राइमरी चुनाव में मतदान करती हुई महिला / REUTERS/Jonathan Drake
कई सालों तक ज्यादातर भारतीय मूल के अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक रहे हैं। लेकिन हालिया सर्वे से पता चलता है कि अब यह स्थिति बदल रही है। कार्नेगी संस्था के एक नए अध्ययन के अनुसार अब भारतीय मूल के अमेरिकियों की राजनीतिक पहचान पहले जैसी नहीं रही है। अब कम लोग खुद को डेमोक्रेटिक पार्टी से जोड़ रहे हैं और ज्यादा लोग खुद को स्वतंत्र मान रहे हैं।
इसका मतलब है कि डेमोक्रेटिक पार्टी को अब इस समुदाय की खास चिंताओं पर ध्यान देना होगा। तभी वह उनका समर्थन दोबारा पा सकेगी। कार्नेगी ने तीन बार सर्वे किया था जिसमें पहला सर्वे 2020 में, दूसरा 2024 में और तीसरा सर्वे 2026 में किया गया था। 2020 में लगभग 52 प्रतिशत भारतीय मूल के अमेरिकी खुद को डेमोक्रेटिक मानते थे। 2024 में यह संख्या घटकर 48 प्रतिशत हो गई। 2026 में यह और घटकर 46 प्रतिशत रह गई।
लेकिन इसका फायदा सीधे रिपब्लिकन पार्टी को नहीं मिला। रिपब्लिकन समर्थकों की संख्या 2020 में 15 प्रतिशत थी। 2024 में यह बढ़कर 19 प्रतिशत हुई। 2026 में यह लगभग वही रही। जो लोग डेमोक्रेटिक पार्टी से दूर हुए, वे रिपब्लिकन नहीं बने। वे खुद को स्वतंत्र बताने लगे।
अमेरिका में अक्सर भारतीय मूल के लोगों को एशियाई समुदाय के साथ जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह समुदाय अपनी अलग पहचान भी रखता है। इस सर्वे में कुछ अहम मुद्दे सामने आए। इनमें आव्रजन, कुशल कामगार वीजा और भेदभाव शामिल हैं।
सर्वे में पाया गया कि दो-तिहाई लोग एक नई वीजा फीस के खिलाफ हैं। यह फीस एक लाख डॉलर है। इसका असर खास तौर पर भारतीय मूल के कामगारों पर पड़ता है। 2024 में नए वीजा आवेदनों में 71 प्रतिशत भारतीय मूल के लोगों के थे। अगर राजनीतिक दल इन मुद्दों पर ध्यान नहीं देंगे, तो उन्हें समर्थन नहीं मिलेगा।
सर्वे में भेदभाव को लेकर चिंता भी सामने आई। कई लोग भेदभाव और कानूनी आव्रजन के रास्तों को लेकर परेशान हैं। हालांकि 71 प्रतिशत लोग मौजूदा सरकार के काम से संतुष्ट नहीं हैं। फिर भी इससे डेमोक्रेटिक पार्टी को ज्यादा समर्थन नहीं मिला। सर्वे यह भी दिखाता है कि इस समुदाय के अंदर अलग-अलग सोच है। युवा लोग ज्यादा डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करते हैं।
50 साल से ज्यादा उम्र के लोग थोड़ा अलग सोच रखते हैं। अमेरिका में जन्मे और हाल में आए लोगों के बीच भी फर्क है। यह साफ है कि यह समुदाय अभी भी डेमोक्रेटिक गठबंधन का हिस्सा है। लेकिन अब उनका समर्थन अपने आप नहीं मिलेगा। राजनीतिक दलों को इसे कमाना होगा। लोग अब देख रहे हैं कि कौन उनकी समस्याओं को समझता है। आव्रजन, नौकरी के मौके और भेदभाव जैसी समस्या बड़े विषय हैं।
यानी राजनीतिक नेताओं के लिए संदेश साफ है। अगर वे इस समुदाय का भरोसा चाहते हैं, तो उन्हें उनकी बात सुननी होगी।
लेखक सीतल कालंत्री सिएटल विश्वविद्यालय के विधि विद्यालय में कानून की प्रोफेसर और सहयोगी डीन हैं। वह राउंडग्लास इंडिया सेंटर की संस्थापक निदेशक भी हैं।
वहीं आशिनी जगतियानी-विलियम्स सिएटल विश्वविद्यालय के राउंडग्लास इंडिया सेंटर में सहायक निदेशक हैं।
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