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भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित संवैधानिक न्यायविद एफएस नरीमन जीवित हैं...अपने लेखन के माध्यम से

उनकी 2012 की आत्मकथा 'बिफोर मेमोरी फेड्स' संविधान द्वारा निर्धारित सिद्धांतों में उनके दृढ़ विश्वास और राजनीति तथा न्यायपालिका के बीच अशांत संबंधों पर उनके व्यक्तिगत विचारों को दर्शाती है।

भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब 1975 में आपातकाल की घोषणा की तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। / Image : IndiaTechOnline.com

भारत के सबसे प्रसिद्ध, सबसे सम्मानित न्यायविद् और देश के प्रमुख संवैधानिक विशेषज्ञ फली सैम नरीमन का 21 फरवरी को तड़के 95 वर्ष की आयु में निधन हो गया। बॉम्बे हाई कोर्ट में 22 वर्षों तक वकालत करने के बाद नरीमन दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट चले गए। वहां वह 1971 से वरिष्ठ वकील थे। नरीमन वर्ष 1972 में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किए गए। मगर जून 1975 में उन्होंने तब इस्तीफा दे दिया जब भारत की तद्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी। 

इसके बाद के दशकों में नरीमन ने भारत की शीर्ष अदालत में आए कुछ सबसे प्रभावशाली मामलों पर बहस की। इन मामलों में से कई फैसले संवैधानिक कानून को प्रभावित करने वाले और ऐतिहासिक रहे। उनके द्वारा लिखी गई कई पुस्तकों (मध्यस्थता पर एक श्रृंखला सहित) में से चार भारतीय न्यायशास्त्र में उनके योगदान के जीवंत प्रमाण के रूप में सामने आती हैं।

उनकी 2012 की आत्मकथा 'बिफोर मेमोरी फेड्स' संविधान द्वारा निर्धारित सिद्धांतों में उनके दृढ़ विश्वास और राजनीति तथा न्यायपालिका के बीच अशांत संबंधों पर उनके व्यक्तिगत विचारों को दर्शाती है। एक गलत निर्णय की स्वीकारोक्ति भी है। विशेष रूप से भोपाल गैस त्रासदी मामले में यूनियन कार्बाइड के बचाव में जिसे बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि वह एक गलती (पेपरबैक रुपये 699) थी। 

'इंडियाज़ लीगल सिस्टम : कैन इट बी सेव्ड' (2017) आपराधिक न्याय प्रणाली के साथ-साथ जनहित याचिका, न्यायिक समीक्षा और न्यायिक सक्रियता जैसे समकालीन न्यायशास्त्र के पहलुओं की जांच करती है। इसमें वह असमानता और सकारात्मक कार्रवाई जैसे सामाजिक मुद्दों को भी संबोधित करते (पेपरबैक 250 रुपये) हैं। 

'गॉड सेव द सुप्रीम कोर्ट' (2018) भारत की शिखर अदालत की कार्यप्रणाली, प्रेस, न्यायपालिका और अल्पसंख्यकों के संबंध में सरकार की नीतियों, सुप्रीम कोर्ट तथा न्यायपालिका, राजनेताओं और संसद, मीडिया और इसके अभिव्यक्ति के अधिकारों की बात करती (पेपरबैक 499 रुपये) है।

नरीमन की महान रचना 'यू मस्ट नो द कॉन्सटीट्यूशन' (सितंबर 2023) भारत के संविधान के इतिहास और उत्पत्ति का पता लगाती है और 31 जुलाई 2023 तक महत्वपूर्ण मामलों और प्रमुख संवैधानिक विकासक्रम की जांच करती है। यह सामान्य व्यक्तियों, छात्रों और कानून का अभ्यास करने वालों के लिए एक संदर्भ के रूप में बेजोड़ (हार्ड कवर 899 रुपये) है। 

ये चारों किताबें अमेज़ॅन और फ्लिपकार्ट जैसी ऑनलाइन साइटों पर रियायती कीमतों पर उपलब्ध हैं। फली नरीमन की ज्ञान की विरासत इन पन्नों में जीवित है।
 

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