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हिंदू धर्म और अमेरिकी संविधान: टकराव नहीं, गहरा सामंजस्य

हिंदू अमेरिकियों के लिए यह वादा हमेशा सहज रहा है। हिंदू सभ्यतागत मूल्य नैतिक आचरण, सत्ता पर संयम, विचारों की बहुलता और अधिकारों व कर्तव्यों के संतुलन पर जोर देते हैं।

यूएस हाउस / Google

हिंदू धर्म-जिसे सनातन हिंदू धर्म भी कहा जाता है और जिसे उसके सभ्यतागत अर्थ में हिंदुत्व कहा जाता है—शासन के लिए एक नैतिक दिशा प्रदान करता है, जबकि अमेरिकी संविधान एक नागरिक ढांचा देता है। ये दोनों व्यवस्थाएं एक-दूसरे के विरोध में नहीं, बल्कि पूरक हैं। दोनों ही व्यक्ति को अर्थपूर्ण जीवन जीने और समाज के प्रति उत्तरदायी बनने के लिए सशक्त करती हैं। दार्शनिक, नैतिक और व्यावहारिक—हर स्तर पर हिंदू धर्म के मूल्य और अमेरिकी संवैधानिक सिद्धांत आपस में मेल खाते हैं।

अमेरिकी संविधान तीन मूल स्तंभों पर आधारित है—स्वतंत्रता, समानता और बहुलता। स्वतंत्रता और समानता आदर्श हैं, जबकि बहुलता वह व्यवस्था है, जो विभिन्न समुदायों को अपनी पहचान बनाए रखते हुए एक साझा नागरिक ढांचे के भीतर सह-अस्तित्व की अनुमति देती है। संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण और संवैधानिक संरक्षण का उद्देश्य विविधता को मिटाना नहीं, बल्कि उसे प्रबंधित करना था। ये सिद्धांत केवल नारे नहीं, बल्कि समान व्यवहार और मूल अधिकारों की व्यावहारिक गारंटी हैं।

हिंदू अमेरिकियों के लिए यह वादा हमेशा सहज रहा है। हिंदू सभ्यतागत मूल्य नैतिक आचरण, सत्ता पर संयम, विचारों की बहुलता और अधिकारों व कर्तव्यों के संतुलन पर जोर देते हैं। दैनिक जीवन में यह कानून के प्रति सम्मान, शिक्षा में निवेश, उद्यमिता और परिवार, समुदाय व नागरिक कर्तव्य के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता के रूप में दिखाई देता है।

अमेरिकी अनुभव में बदलाव
फिर भी, हाल के वर्षों में कुछ बदल गया है। संवैधानिक आदर्शों से गहरे जुड़ाव और योगदान के मजबूत रिकॉर्ड के बावजूद, हिंदू अमेरिकियों को अब विश्वास की जगह संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। उनके धर्म को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है, उनकी नागरिक निष्ठा पर सवाल उठाए जा रहे हैं और उनकी उपस्थिति को मूल्यवान मानने के बजाय “प्रबंधित करने योग्य” समस्या की तरह देखा जा रहा है।

यह विरोधाभास कैसे पैदा हुआ?
विवेक रामास्वामी की उम्मीदवारी के दौरान उन पर हुए लगातार आपत्तिजनक हमलों ने अंततः उन्हें सोशल मीडिया से दूर होने पर मजबूर किया। हाल के वर्षों में विवेक रामास्वामी और नील पटेल सहित कई हिंदू उम्मीदवारों को खुले धार्मिक विरोध का सामना करना पड़ा। एक चर्चित घटना में सार्वजनिक रूप से यह सवाल उठाया गया कि क्या रामास्वामी का हिंदू होना उन्हें राजनीतिक पद के लिए अयोग्य बनाता है—जो धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी की बुनियादी समझ के अभाव को दर्शाता है।

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ये घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं। ये हिंदूफोबिया—हिंदुओं के खिलाफ धार्मिक पूर्वाग्रह—में बढ़ोतरी का संकेत देती हैं, जिसे कोएलिशन ऑफ हिंदूज़ ऑफ नॉर्थ अमेरिका और हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन जैसे संगठनों ने दस्तावेज़ किया है। यह धारणा कि हिंदू आस्था और अमेरिकी लोकतंत्र असंगत हैं, गंभीर जांच की मांग करती है। इसका उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

हिंदू धर्म और संविधान
हिंदू धर्म के केंद्र में एक मूल विचार है—एक ही दिव्य सत्य सभी प्राणियों में विद्यमान है। उपनिषदों का वाक्य “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इसे स्पष्ट करता है। हर व्यक्ति में समान आध्यात्मिक क्षमता है। इसलिए भेदभाव और अमानवीकरण स्वयं हिंदू धर्म का उल्लंघन हैं।

हिंदू परंपराओं ने कभी भी एकरूपता की मांग नहीं की। वे शास्त्र-बोध और शत्रु-बोध—तर्कपूर्ण विचार, संवाद और विवेक के अभ्यास—पर बल देती हैं, साथ ही वास्तविक खतरों की पहचान और प्रतिरोध की जिम्मेदारी भी सिखाती हैं। नैतिक संपत्ति सृजन, उद्यमिता, कानून का सम्मान और जवाबदेह शासन हिंदू सभ्यता के परिधीय नहीं, बल्कि मूलभूत मूल्य हैं।

अमेरिकी संदर्भ में समानताएं स्पष्ट हैं—अंतरात्मा की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता, बहुलता और यह अपेक्षा कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी हो। हिंदू धर्म इन सिद्धांतों के विरोध में नहीं है; उसने इन्हें अपनी सभ्यतागत यात्रा में स्वयं अर्जित किया है।

आज की कई गलतफहमियों का केंद्र “हिंदुत्व” शब्द है, जिसे अमेरिका में शैक्षणिक और मीडिया क्षेत्रों में व्यापक रूप से गलत प्रस्तुत किया गया है। 2023 में बैंकॉक में हुए वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस में स्पष्ट किया गया कि हिंदुत्व का आशय सनातन हिंदू धर्म की सभ्यतागत आत्मा से है, न कि किसी राजनीतिक विचारधारा से। यह स्पष्टीकरण उन शैक्षणिक अभियानों के जवाब में था, जिन्होंने हिंदुत्व को चरमपंथ या श्वेत वर्चस्ववाद से गलत तरीके से जोड़ा।

हिंदू संगठनों और विद्वानों के दस्तावेज़ बताते हैं कि ऐसी प्रस्तुतियां सावधानीपूर्ण शोध नहीं, बल्कि विकृति का परिणाम हैं। जब सभ्यतागत अवधारणाओं को ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भ के बजाय वैचारिक पूर्वाग्रह से देखा जाता है, तो भ्रामक कथाएं संस्थागत पूर्वाग्रह का रूप ले लेती हैं। विडंबना यह है कि बहुलता, संवाद, नैतिक संयम और नागरिक जिम्मेदारी में निहित एक परंपरा को लोकतंत्र के लिए असंगत बताया जा रहा है—जबकि उसके मूल्य उसी संविधान से मेल खाते हैं, जो सभी अमेरिकियों की रक्षा के लिए बना है।

योगदान का ठोस रिकॉर्ड
हिंदू अमेरिकियों का वास्तविक रिकॉर्ड इस सामंजस्य को और मजबूत करता है। अमेरिका की आबादी में जहां हिंदुओं की हिस्सेदारी लगभग 1.5 प्रतिशत है, वहीं वे संघीय आयकर में करीब 6 प्रतिशत का योगदान देते हैं। आर्थिक शोध के अनुसार, भारतीय प्रवासी किसी भी अन्य प्रवासी समूह की तुलना में सबसे अधिक शुद्ध सकारात्मक राजकोषीय योगदान देते हैं—30 वर्षों में प्रति परिवार लगभग 17 लाख डॉलर की बचत।

सरकारी सहायता के उपयोग के सार्वजनिक आंकड़े भी इस अंतर को रेखांकित करते हैं—देशवार सूची में भारत का नाम उल्लेखनीय रूप से अनुपस्थित है। हिंदू अमेरिकी चिकित्सा, तकनीक, इंजीनियरिंग, लघु व्यवसाय, शिक्षा और सार्वजनिक सेवा में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। उनके मंदिर स्व-वित्तपोषित और गैर-धर्मांतरणकारी हैं, और उनकी नागरिक भागीदारी निरंतर व स्थिर है।

राजनीतिक स्पेक्ट्रम में इस वास्तविकता की व्यापक स्वीकृति है। सर्वेक्षण बताते हैं कि भारतीय प्रवासन से अमेरिका को लाभ हुआ है। यह समुदाय देश की सफलता में गहराई से निवेशित है।

सीमांत शत्रुता से संस्थागत संदेह तक
इस रिकॉर्ड के बावजूद, साक्ष्यों के बजाय कथाओं से प्रेरित शत्रुता बढ़ी है। कुछ श्वेत वर्चस्ववादी समूहों ने ऑनलाइन मंचों पर भारतीयों और हिंदुओं के खिलाफ बयानबाजी को बढ़ाया है, कुशल प्रवासियों को जनसांख्यिकीय या आर्थिक खतरे के रूप में चित्रित किया है। जांच से पता चलता है कि इस सामग्री का बड़ा हिस्सा विदेशी बॉट नेटवर्क द्वारा कृत्रिम रूप से फैलाया गया है।

H-1B वीज़ा कार्यक्रम इस निर्मित शत्रुता का केंद्र बन गया है। “रिप्लेसमेंट” जैसी भाषा में हिंदू और भारतीय पेशेवरों को धोखेबाज़ या नौकरी चुराने वाले बताया जाता है, जबकि आंकड़े दिखाते हैं कि H-1B कर्मचारी महत्वपूर्ण कमी वाले क्षेत्रों को भरते हैं और कुल श्रमबल का छोटा हिस्सा हैं। व्यापक धोखाधड़ी के दावे निराधार हैं और मुख्यतः नस्ली प्रचार का काम करते हैं।

अधिक चिंताजनक यह है कि ये कथाएं ऑनलाइन सीमाओं से निकलकर संस्थानों तक पहुंच रही हैं। हिंदू उम्मीदवारों को खुले धार्मिक विरोध का सामना करना पड़ा है। कैलिफोर्निया का SB-403 और उससे जुड़े कदमों ने, मौजूदा नागरिक अधिकार कानूनों के बावजूद, हिंदुओं को असमान रूप से संदिग्ध के रूप में पेश किया। जब ऐसी कथाएं कानून का रूप लेती हैं, तो परिणाम संरक्षण नहीं, बल्कि कलंक होता है।

इसके परिणाम अब सैद्धांतिक नहीं रहे। अमेरिका भर में हिंदू मंदिरों पर हमलों की लहर ने समुदाय को झकझोर दिया है। बिना चुनौती के छोड़ी गई विकृतियां पहले भाषा में, फिर संस्थानों में और अंततः वास्तविक नुकसान में बदल जाती हैं।

मानवीय कीमत
इन विकृतियों का सबसे बड़ा असर हिंदू परिवारों और युवाओं पर पड़ता है। शिक्षा सामग्री में हिंदू धर्म को गलत तरीके से जाति उत्पीड़न से जोड़ने से स्कूलों में बुलिंग और मानसिक पीड़ा बढ़ी है, जिससे हिंदू छात्रों को प्राधिकार के सामने अपनी पहचान का बचाव करना पड़ता है।

शैक्षणिक अनुसंधान केंद्रों, हेट-क्राइम आंकड़ों और राज्य रिपोर्टिंग कार्यक्रमों के डेटा में हिंदू-विरोधी घटनाओं में स्पष्ट वृद्धि दिखती है। कुछ अध्ययन यह भी संकेत देते हैं कि गलत धारणाओं पर आधारित डाइवर्सिटी, इक्विटी और इन्क्लूजन ढांचे शत्रुता को कम करने के बजाय बढ़ा सकते हैं।

इतिहास चेतावनी देता है—जब निर्मित नफरत सामान्य हो जाती है, तो वह केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती।

एक सवाल, जिसका जवाब जरूरी है
यदि हिंदू मूल्य अमेरिकी संविधान की नैतिक नींव से मेल खाते हैं, और यदि हिंदू अमेरिकियों ने निरंतर नागरिक योगदान और कानून का पालन प्रदर्शित किया है, तो फिर यह समुदाय बढ़ते संदेह का केंद्र क्यों बन रहा है? उत्तर न तो संवैधानिक सिद्धांतों में है, न ही वास्तविक अनुभव में। उत्तर उन चयनात्मक कथाओं में है, जो बहुलता को विकृत करती हैं और समानता को निष्पक्षता के बजाय वैचारिक चश्मे से लागू करती हैं।

निष्पक्षता की अपील
हिंदू अमेरिकी विशेष व्यवहार नहीं मांग रहे। वे उसी संविधान के तहत समान व्यवहार चाहते हैं, जिसे वे सम्मान देते हैं, निभाते हैं और बनाए रखने में योगदान करते हैं। बहुलता के प्रति प्रतिबद्ध लोकतंत्र चयनात्मक संदेह का बोझ वहन नहीं कर सकता—खासकर उन समुदायों के प्रति, जिनके मूल्य और आचरण उसके संस्थापक आदर्शों से इतने निकटता से मेल खाते हों। यह विरोधाभास अब स्पष्ट है। अमेरिकी संस्थान इसे खुले तौर पर संबोधित करते हैं या चुपचाप गहराने देते हैं—यही तय करेगा कि उन आदर्शों को कितनी ईमानदारी से निभाया जाता है।

गीता सिकंद हिंदूफोबिया के खिलाफ लेखन करने वाली हिंदू लेखिका, मीडिया विश्लेषक और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, इरविन में कार्डियोलॉजी की एसोसिएट क्लिनिकल प्रोफेसर हैं। वह Americans4Hindus में संचार और सामुदायिक संपर्क की उपाध्यक्ष भी हैं।

(यह लेख लेखक के निजी विचार प्रस्तुत करता है और आवश्यक नहीं कि न्यू इंडिया अब्रॉड की आधिकारिक नीति या दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करे।)

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