सांकेतिक तस्वीर... / CANVA
बंदूक हिंसा अब अधिकांश अमेरिकियों से न तो दूर की बात है और न नई। खासकर युवा, अब इस खतरे को ध्यान में रखकर अपनी जिंदगी की योजना बना रहे हैं। आज के छात्रों के लिए लॉकडाउन ड्रिल अब सिर्फ अभ्यास नहीं हैं। कुछ किशोर जो कभी शूटिंग के दौरान क्लासरूम में छिपे थे, वे अब टॉप यूनिवर्सिटीज में भी कॉलेज शुरू कर रहे हैं, और जो उन्होंने झेला है, उसका असर उन पर पहले से ही दिख रहा है।
यह सच्चाई परेशान करने वाली है। होनी भी चाहिए। किसी भी देश को यह स्वीकार नहीं करना चाहिए कि कोई बच्चा एक मास शूटिंग से बच जाए और बड़ा होने से पहले उसे दूसरी का सामना करना पड़े। फिर भी ऐसा हो रहा है। बंदूक हिंसा रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है। कोई भी स्कूल सच में सुरक्षित नहीं है, चाहे उसका नाम, रेप्युटेशन या लोकेशन कुछ भी हो।
लोग अक्सर इस बात पर ध्यान देते हैं कि मास शूटिंग ज्यादा हो रही हैं या कम। लेकिन यह बहस असली मुद्दे से भटक जाती है। पब्लिक जगहों पर प्लान किए गए हमले अभी भी लोगों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। ये शूटिंग लोगों को एग्जिट चेक करने, अपने फोन साइलेंट रखने और स्कूलों या पब्लिक जगहों पर सुरक्षा के बारे में चिंता करने पर मजबूर करती हैं। सिर्फ एक घटना पब्लिक सुरक्षा पर सालों के भरोसे को खत्म कर सकती है।
बेशक, नीति से फर्क पड़ता है। जो टीमें खतरों का आकलन करती हैं, इमरजेंसी प्लान बनाती हैं, और सुधार लागू करती हैं, उन्होंने शायद कुछ हमलों को रोका है। लेकिन सिर्फ रोकना ही काफी नहीं है। अगर हम बढ़ते हुए बच्चों के लिए लगातार बंदूक हिंसा को आम बात मान लेते हैं, तो हम पहले से ही मुश्किल में हैं। यह मुद्दा सिर्फ बंदूक या कानूनों के बारे में नहीं है। यह अकेलेपन, निराशा, और एक ऐसी संस्कृति के बारे में भी है जो अक्सर हिंसा के जरिए फेम पाने वालों पर ध्यान देती है।
बंदूक हिंसा से बचे युवा अमेरिकियों के लिए, नेताओं का संदेश अक्सर खोखला लगता है। उनसे मजबूत बनने के लिए कहा जाता है। उन्हें सांत्वना और प्रार्थनाएं दी जाती हैं। फिर उनसे क्लास में लौटने के लिए कहा जाता है। उन्हें शायद ही कभी यह भरोसा दिलाया जाता है कि जिंदा रहना बार-बार की जरूरत नहीं होगी।
यह सिर्फ युवाओं की समस्या नहीं है। यह पूरे देश को प्रभावित करती है। अगर कोई देश अपने बच्चों को सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षित नहीं रख सकता तो वह बुनियादी स्तर पर फेल हो रहा है। जब तक हम इस सच्चाई का सामना नहीं करते, डर बना रहेगा, चाहे आंकड़े कुछ भी दिखाएं।
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