प्रतीकात्मक तस्वीर / Generated using AI
4 जुलाई 2026 को अमेरिका अपनी आजादी की 250वीं वर्षगांठ मनाएगा। यह उस ऐतिहासिक पल की सालगिरह है जब 1776 में फिलाडेल्फिया में जमा हुए कुछ साहसी विद्रोहियों ने दुनिया की सबसे ताकतवर साम्राज्यवादी ताकत को चुनौती दी थी। अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा पत्र महज ब्रिटिश ताज से अलगाव का औपचारिक दस्तावेज नहीं था, बल्कि यह शासन के एक नए दर्शन का जोरदार ऐलान था।
'सभी मनुष्य समान हैं' का ऐलान
इस ऐतिहासिक दस्तावेज ने यह दावा करके राजनीतिक वैधता के स्रोत को राजाओं के दैवीय अधिकार से बदलकर 'शासितों की सहमति' पर ला दिया। घोषणा पत्र में कहा गया कि सभी मनुष्य समान हैं और उन्हें कुछ अपरिहार्य अधिकार प्राप्त हैं। यह एक जुआ था, जिसने 13 बिखरी हुई कॉलोनियों को एक नए राष्ट्र में बदल दिया।
एक जीवंत चुनौती
2026 से पीछे मुड़कर देखें तो यह घोषणा पत्र एक स्थिर अवशेष नहीं, बल्कि हर पीढ़ी के लिए एक 'जीवंत' चुनौती की तरह है। हालांकि 1776 का घोषणा पत्र अपने आदर्शों पर खरा नहीं उतरा - खासकर गुलामी को बरकरार रखना और महिलाओं को बाहर करना - लेकिन इस दस्तावेज की भाषा ने ही सुधारवादियों को न्याय की मांग करने के लिए औजार दिए। इसकी विरासत एक 'बेहतर संघ' की निरंतर और उथल-पुथल भरी खोज में देखी जा सकती है।
सभ्यताओं के उत्थान और पतन का चक्र
अपनी प्रतिभा के बावजूद, संस्थापक पिता शायद कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाओं से अनभिज्ञ थे। इतिहास बताता है कि सभी सभ्यताएं, चाहे वे कितनी भी महान क्यों न हों, अंततः पतन की ओर बढ़ती हैं। यह प्राचीन भारत जैसी महान सभ्यताओं और हालिया ग्रीस पर भी सच है। यह उत्थान और पतन मानव मानसिकता के तीन घटकों - एस (स्थिरता/शांति/सत्व), आर (अशांति/रजोगुण), और टी (जड़ता/तमोगुण) में बदलाव से प्रेरित होता है।
जब किसी समाज में एस घटक बढ़ता है, तो समाज उठता है। जब एस अपने चरम पर पहुंचता है, तो टी घटक हावी होने लगता है और समाज पतन की ओर बढ़ता है। यह चक्र हजारों वर्षों में चलता रहता है।
अमेरिका के लिए आगे की राह
आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका का उत्थान तो तेजी से हुआ, लेकिन हाल के आंकड़े चिंताजनक संकेत दिखाते हैं। देश में बढ़ता ध्रुवीकरण सामूहिक मानसिकता में हो रहे इस बदलाव का एक लक्षण है।
अगले 250 सालों तक अमेरिका को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए नागरिकों की 'आंतरिक भावनात्मक उत्कृष्टता' को बढ़ाना होगा। यानी सामूहिक मानसिकता को प्रमुख आर और टी घटकों से वापस एस घटक की ओर ले जाना होगा। इसके लिए ध्यान (मेडिटेशन) को प्राथमिक उपकरण बताया गया है।
लेखक का कहना है कि गणतंत्र की लंबी उम्र शासितों की मानसिकता पर निर्भर करती है, इसलिए आंतरिक उत्कृष्टता विकसित करना 21वीं सदी की सर्वोच्च देशभक्ति है। यह रास्ता सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि यूरोप पर भी लागू होता है।
250 साल के इस मोड़ पर हमें यह समझना होगा कि अकेले राजनीतिक दस्तावेज किसी गणतंत्र को टिकाए नहीं रख सकते। स्वतंत्रता घोषणा पत्र ने ढांचा दिया, लेकिन राष्ट्र की दीर्घायु उसके लोगों की 'आंतरिक भावनात्मक उत्कृष्टता' पर निर्भर करती है।
लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ लुइसविले में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के पूर्व अध्यक्ष और एमेरिटस प्रोफेसर हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार और राय लेखक के निजी हैं और जरूरी नहीं कि वे न्यू इंडिया अब्रॉड की आधिकारिक नीति या स्थिति को प्रतिबिंबित करते हों।)
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