250 @ 250: भारतीय-अमेरिकी कहानी / 250moments.indiaspora.org
मैंने टेक इंडस्ट्री में 15 साल बिताए। हर कोई सोचता है कि सिलिकॉन वैली अमीर और मशहूर बनने का रास्ता है, लेकिन इस रास्ते में नाकामियां और निराशा भी मिलती हैं। इस सफर में मुझे भी कुछ नाकामियों का सामना करना पड़ा, लेकिन किस्मत से मैं एक सफल IPO का हिस्सा बना। जब वह दौर खत्म हुआ, तो मैं कुछ अलग करना चाहता था। मैं शुरुआती एंजेल इन्वेस्टर्स में से एक बना- इतनी जल्दी कि वॉल स्ट्रीट जर्नल में मेरे बारे में पहले पन्ने पर खबर छपी और फोर्ब्स की टॉप इन्वेस्टर्स की 'मिडास लिस्ट' में मुझे जगह मिली। किसी भी नजरिए से देखें, तो यह एक सफल दौर था।
लेकिन मुझे बार-बार एक बात समझ आती थी: मैं लोगों से जुड़ने वाला इंसान हूं। डील्स और मुनाफे से मुझे जोश नहीं मिलता था- बल्कि लोगों से बने रिश्तों से मिलता था। इसलिए मैंने फिर से एक नया कदम उठाया और एक अलग सवाल पूछा: लोगों को जोड़ने की मेरी यह सोच असल में क्या बना सकती है?
तीस साल पहले, मैंने एक दांव लगाया- किसी कंपनी या मार्केट पर नहीं, बल्कि इस सोच पर कि सफल लोगों का एक ऐसा समुदाय बनाया जा सकता है जो लेने के बजाय देने पर केंद्रित हो।
यह सोच 1997 में हकीकत बनी, जब मैंने 'एंटरप्राइज' नाम का एक कार्यक्रम आयोजित किया। यह सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री के टॉप 100 CEOs के लिए एक रिट्रीट (मिलन समारोह) था। इसे तैयार करने में मैंने कई महीने लगाए, और हमने इसे एक आसान से विचार पर आधारित किया: सारा बचा हुआ पैसा नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं को दिया जाएगा। हमने ऐसी छोटी नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं पर ध्यान दिया जिनके फाउंडर अभी भी उन्हें चला रहे थे। ऐसी संस्थाएं जिनकी दिशा एक सार्थक दान से सचमुच बदल सकती थी।
पंद्रह सालों में, इस रिट्रीट के जरिए सीधे तौर पर 2.5 मिलियन डॉलर से ज्यादा की रकम दान की गई। असली असर तो खुद CEOs की वजह से हुआ, जिन्होंने अपने पैसे दान किए, अपनी कंपनियों के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड का इस्तेमाल किया, और उन संस्थाओं के लिए मेंटर और बोर्ड मेंबर बने। वे सिर्फ चेक लिखने वाले नहीं, बल्कि देने वालों का एक समुदाय बन गए।
दूसरी कम्युनिटी 'कॉर्पोरेट ईको फोरम' (CEF) थी, जिसे मैंने 2008 में शुरू किया था। यह दुनिया की 85 सबसे बड़ी कंपनियों (जिनका कुल रेवेन्यू $6 ट्रिलियन से अधिक है) के 'चीफ सस्टेनेबिलिटी ऑफिसर्स' का एक ऐसा नेटवर्क था, जिसमें सिर्फ बुलाए गए लोग ही शामिल हो सकते थे। CEF का मकसद सिर्फ पैनल डिस्कशन या प्रेजेंटेशन करना नहीं था; बल्कि इसका मकसद खुलकर और आपस में बातचीत करना था। CSO बिना किसी पब्लिक फोरम की पाबंदियों के यह बता सकते थे कि क्या काम कर रहा है, क्या नहीं, और उन्हें कहां मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सस्टेनेबिलिटी लीडरशिप एक अकेलापन भरा काम हो सकता है। CEF को इसी स्थिति को बदलने के लिए बनाया गया था।
असल में, भरोसा ही असली आधार है। CEF इसलिए कामयाब है क्योंकि सदस्यों को पता होता है कि यह जगह सुरक्षित है। यानी जो बातें यहां शेयर की जाती हैं, वे साथियों के बीच ही रहती हैं। जब यह भरोसा होता है, तो लोग अपनी असली परेशानियां सामने लाते हैं। और जब असली परेशानियों पर मिलकर काम किया जाता है, तो असली तरक्की होती है।
14 साल पहले, मैंने एक तीसरी कम्युनिटी - 'इंडियास्पोरा' (Indiaspora) - शुरू की। इसका मकसद दुनिया भर में फैले भारतीयों (डायस्पोरा) को 'सेवा' के सिद्धांत- यानी अच्छाई के लिए काम करने वाली ताकत बनने के लिए निस्वार्थ सेवा- के आधार पर एक साथ लाना था। यह भावना कोविड के दौरान साफ तौर पर दिखी, जब इंडियास्पोरा और उसके सहयोगियों ने भारत में राहत कार्यों के लिए $15 मिलियन और अमेरिका में फूड बैंकों के लिए $1 मिलियन जुटाए।
इस कम्युनिटी ने USPS से दिवाली का पोस्टेज स्टैम्प भी जारी करवाया- जो अपनापन दिखाने वाला एक छोटा लेकिन असरदार प्रतीक था। आज इंडियास्पोरा कनाडा, UK, सिंगापुर, UAE, ऑस्ट्रेलिया और भारत तक फैला हुआ है और दुनिया भर में फैले 3.5 करोड़ भारतीयों को अच्छाई के काम के लिए एक साथ जोड़ता है।
इनमें से कोई भी काम अकेले नहीं किया गया। ये सभी कोशिशें इसलिए कामयाब हुईं क्योंकि दूसरे लोगों- जैसे बिजनेस लीडर्स, दान करने वाले और अलग-अलग महाद्वीपों के कम्युनिटी सदस्यों ने अपनी ऊर्जा, संसाधन और उदारता का योगदान दिया। मेरा काम बस ऐसा माहौल बनाना था जिससे ये सब हो सके।
जब हम इस 4 जुलाई को अमेरिका का 250वां जन्मदिन मना रहे हैं, तो मैं सोच रहा हूं कि जब समुदाय अच्छाई के लिए एक ताकत बनते हैं, तो कितना बड़ा असर होता है! यह सफर जारी है।
(लेखक 'इंडियास्पोरा' के संस्थापक हैं)
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