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फिल्ममेकर बेन रेखी: पिता से सीखे उद्यमिता के सबक, सिनेमा को मानते हैं स्टार्टअप

बेन का मानना है कि उनके पिता ने यह भी समझ लिया था कि जीवन का असली उद्देश्य किसी पर थोपा नहीं जा सकता।

फिल्ममेकर बेन रेखी / image provided

प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक, निर्माता और पटकथा लेखक बेन रेखी ने अपनी रचनात्मक यात्रा में उद्यमिता के कई अहम सबक अपने पिता कंवल रेखी से सीखे हैं। कंवल रेखी सिलिकॉन वैली के दिग्गज उद्यमी हैं और वह नैस्डैक पर वेंचर-बैक्ड कंपनी को पब्लिक करने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी रहे हैं। शुरुआत में वे कला और फिल्मों को लेकर थोड़े संदेह में थे, लेकिन समय के साथ उन्होंने न सिर्फ बेटे के फैसले को स्वीकार किया, बल्कि उसका समर्थन भी किया।

बेन रेखी बताते हैं, “मेरे पिता शुरुआत में थोड़े हिचकिचा रहे थे। लेकिन हाई स्कूल में जब हमने एक साल तक एक प्रोजेक्ट पर काम किया और उसे स्थानीय थिएटर में प्रीमियर किया, तो पापा खुद टिकट बेचते नजर आए। उसी पल उन्हें एहसास हुआ कि इसमें भी एक बिज़नेस हो सकता है।”

बेन का मानना है कि उनके पिता ने यह भी समझ लिया था कि जीवन का असली उद्देश्य किसी पर थोपा नहीं जा सकता। “उन्होंने महसूस किया कि अगर वे मुझे इससे रोकेंगे तो हम दोनों ही दुखी होंगे। उन्होंने मुझे इस क्रिएटिव फील्ड के जोखिम जरूर बताए, जो सच भी साबित हुए, लेकिन कभी मेरे रास्ते में बाधा नहीं बने। आज वे मेरे सबसे बड़े समर्थकों में से एक हैं।”

फिल्ममेकिंग यानि उद्यमिता
बेन रेखी को अपने पिता से यह सलाह भी मिली कि फिल्ममेकिंग को उद्यमिता की तरह देखें। “उन्होंने कहा कि हर फिल्म प्रोजेक्ट को एक नई कंपनी शुरू करने जैसा समझो। आपको आइडिया निवेशकों और टीम को बेचना होता है, फंड जुटाना होता है, प्रोडक्ट बनाना, उसका मार्केटिंग करना और तय बजट व समय में टीम को मैनेज करना होता है।” बेन मानते हैं कि जीवन कौशल और उद्यमिता से जुड़े कई सबक जो उन्होंने पिता से सीखे, वे सीधे तौर पर फिल्ममेकिंग में काम आते हैं।

रचनात्मक सफर और अंतःप्रेरणा पर भरोसा
अमेरिकी और भारतीय फिल्मों से लेकर फिक्शन, नॉन-फिक्शन, ड्रामा और थ्रिलर तक—बेन रेखी का सफर बेहद रोमांचक रहा है। उनका मानना है कि एक क्रिएटिव इंसान की यात्रा अपनी अद्वितीय दृष्टि के और करीब पहुंचने की होती है। “फिल्ममेकिंग में व्यावसायिक पहलू जरूर है, लेकिन यह एक कलात्मक प्रक्रिया भी है। अगर आप हर चीज़ को ज्यादा रणनीति या दिमाग से सुलझाने की कोशिश करते हैं, तो मुश्किल में पड़ सकते हैं। एक कलाकार के तौर पर आपको ज़्यादा अंतःप्रेरणात्मक होना पड़ता है।”

वे कहते हैं कि उन्होंने सीख लिया है कि अपने भीतर बहने वाली ऊर्जा को सुनना जरूरी है। “जिन फिल्मों पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है, उनमें ‘लाइटनिंग इन अ बॉटल’ जैसा अनुभव हुआ है—जब एक विचार आपको पूरी तरह जकड़ लेता है और आप उसे पूरा किए बिना रुक नहीं पाते।”

‘वॉच लिस्ट (मारिया)’ और सफलता की नई परिभाषा
बेन रेखी की 2019 में फिलीपींस में बनी क्राइम थ्रिलर ‘वॉच लिस्ट (मारिया)’ को वे एक खास अनुभव मानते हैं। “मुझे लगा जैसे वह फिल्म मेरे जरिए बनी, मैं बस उसका माध्यम था। अब मेरे लिए सफलता का मतलब यह नहीं कि फिल्म ने कितना पैसा कमाया, बल्कि यह है कि क्या उस सफर में मुझे उद्देश्य का एहसास हुआ।”

ऑस्कर-योग्य डॉक्यूमेंट्री और सामाजिक प्रभाव
बेन रेखी की नई डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट फिल्म ‘द ब्रेकथ्रू ग्रुप’ ऑस्कर के लिए क्वालिफाई कर चुकी है। यह फिल्म नशे और अवसाद से जूझ रहे लोगों के लिए बने एक केयर और रिहैब प्रोग्राम पर आधारित है।
“यह फिल्म मेरी निजी जिंदगी के संघर्षों से निकली है। मैंने खुद उस सुविधा केंद्र में समय बिताया, वहां रहकर लोगों का भरोसा जीता, उनके साथ खाना खाया और उनके सबसे अंधेरे पलों को करीब से देखा।”

बेन का मानना है कि फिल्ममेकिंग नैरेटिव तोड़ने और नए नैरेटिव गढ़ने का शक्तिशाली माध्यम है। “इस फिल्म का दर्शकों पर एक उपचारात्मक प्रभाव पड़ा है, जिसकी हमें उम्मीद नहीं थी। यह हमें दिखाती है कि हम अपने संदेह और असुरक्षाओं में अकेले नहीं हैं।”

भारतीय-अमेरिकी कहानियां और वैश्विक दर्शक
बेन रेखी मानते हैं कि भारतीय-अमेरिकी डायस्पोरा की कई कहानियां हैं, जिन्हें फिल्मों के जरिए सामने लाया जाना चाहिए। हालांकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि एक फिल्म का भारत और अमेरिका—दोनों बाज़ारों में एक साथ काम करना बेहद मुश्किल होता है। “आपको अक्सर एक बाज़ार चुनना पड़ता है। हालांकि ‘द लंचबॉक्स’ जैसी कुछ फिल्में अपवाद होती हैं, जो दोनों जगह चलीं। असली चुनौती भारतीय कहानियों को वैश्विक दर्शकों के लिए इस तरह कहना है कि वे सबको जोड़ सकें।”

बॉलीवुड का अनुभव
पिछले 12 वर्षों में करीब चार साल मुंबई में बिताने वाले बेन रेखी बॉलीवुड को एक बिल्कुल अलग दुनिया मानते हैं। “तकनीकी स्तर पर भारतीय क्रू दुनिया के सर्वश्रेष्ठ क्रूज़ में से हैं। कहानियों और कलाकारों में भी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है। इस माहौल में काम करना मेरे लिए एक बड़ा लर्निंग एक्सपीरियंस रहा है।”

वे कहते हैं कि उनकी खासियत एक आउटसाइडर का नजरिया है, जो भारतीय कहानियों को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है। “अगर कोई फिल्म सिर्फ भारतीय दर्शकों के लिए बनी हो, तो शायद वह मेरे लिए उतनी दिलचस्प न हो। मेरा कौशल सेट कहानियों को वैश्विक स्तर पर खोलने में है।”

बेन रेखी की कहानी इस बात का उदाहरण है कि रचनात्मकता और उद्यमिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं- बशर्ते उद्देश्य और जुनून स्पष्ट हो।

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