भरत सिंह भारती / image provided
भारत के 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कार 2026 की सूची में बिहार के वरिष्ठ भोजपुरी लोकगायक और समाजसेवी, “भरत सिंह भारती” का नाम पढ़ कर ऐसा लगा, सच्ची लगन का पुरस्कार देर-सबेर जरूर मिलता है।
इससे पहले इन्हें बिहार सरकार द्वारा राज्य कला पुरस्कार, विंध्यवासिनी देवी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश के गड़हा महोत्सव में भोजपुरी रत्न सम्मान, लोक-रंग सम्मान , नाटक अकादमी अमृत पुरस्कार आदि सहित कई मंचों पर सम्मानित किया जा चुका है।
भरत सिंह भारती का जन्म 20 नवम्बर 1936 को भोजपुर जिला के नोनउर गांव में हुआ। इनके पिता स्वर्गीय सत्यनारायण सिंह भी एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे लेकिन इन्हें उनसे सीखने का मौक़ा नहीं मिला। मात्र छह बरस की उम्र में ही पिता का साया इनके सिर से उठ गया।
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उन दिनों गांवों में कीर्तन मंडलियाँ हुआ करती थी। संगीत विरासत में मिली तो थी लेकिन माँ की इक्षा ना थी। इधर भरत सिंह का संगीत प्रेम इतना गहरा की मात्र 10 वर्ष की आयु में ही गांव की कीर्तन मंडलियों से गायन शुरू कर दिया। 15 वर्ष की उम्र में बिहार के प्रसिद्ध गुरु पंडित शंकर प्रसाद सिंह से संगीत की विधिवत शिक्षा प्राप्त की। बाद के बरसों में लोकगायन के साथ-साथ तबला, हारमोनियम, बांसुरी, सितार, ढोलक आदि वाद्य यंत्रों को बजाना भी सीखा।
रेडियो पर लोकगीतों की प्रस्तुति के साथ -साथ इन्होंने लोकगीतों को सहेजने और गढ़ने का भी काम शुरू कर दिया। लोरी, पवरिया, जतसार, निर्गुण, चौहट, कीर्तनीय, डोमकच, बसंत और विदेशिया जैसे लोकगीतों को उन्होंने न केवल संरक्षित किया, बल्कि मंच, रेडियो और दूरदर्शन द्वारा घर-घर पहुचानें का काम भी किया। देश के आलवा विदेशों में भी इन्होंने लोकगीतों की प्रस्तुति दी।
भारती जी का लोकसंगीत को आगे बढ़ाने का जुनून ऐसा की अपने गांव नोनउर और पटना में 'तारा इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग', 'भारती संगीत कला मंदिर' की भी स्थापना की। हज़ारों बच्चों, युवाओं और महिलाओं को निःशुल्क लोक संगीत की शिक्षा दी है और आज भी उम्र के 90 साल में भी सिखाने का कर्म चल रहा है।
भोजपुरी लोकगीतों के साथ सामजिक स्तर पर उनका योगदान देखकर बिहार सरकार ने उनकी जीवनी 9 वीं कक्षा के एनसीईआरटी हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल है।
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