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पद्मश्री डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी: विज्ञान, रंगमंच और सेवा का दुर्लभ संगम

डॉ. रस्तोगी का वैज्ञानिक जीवन चार दशकों से अधिक का रहा। CDRI में वे बायोकेमिस्ट्री विभागाध्यक्ष और डायरेक्टर-ग्रेड वैज्ञानिक तक पहुंचे और 2003 में सेवानिवृत्त हुए।

पद्मश्री डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी / Zafar Iqbal

लखनऊ के डॉ. अनिल कुमार रस्तोगी को वर्ष 2026 का पद्मश्री सम्मान मिलना एक ऐसी जीवन यात्रा का उत्सव है, जिसमें विज्ञान, कला और समाजसेवा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी रही हैं। प्रख्यात वैज्ञानिक, वरिष्ठ रंगकर्मी, चर्चित फिल्म-टेलीविजन अभिनेता और समर्पित समाजसेवी डॉ. रस्तोगी बहुआयामी प्रतिभा के दुर्लभ उदाहरण हैं।

मैंने डॉ. रस्तोगी को पहली बार लखनऊ विश्वविद्यालय के बायोकेमिस्ट्री विभाग में अपने तत्कालीन सीनियर के रूप में जाना। हम दोनों के करियर की शुरुआत केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (CDRI), लखनऊ से हुई—जहां वे 1962 में जूनियर रिसर्च फेलो बने और मैं एक वर्ष बाद। आज भी उनकी मोटरसाइकिल पर बैठकर पीएचडी की अनिवार्यता के तहत फ्रेंच क्लास जाने की यादें ताजा हैं। 1962 में सुधा जी से उनके विवाह में शामिल होना मेरे लिए सौभाग्य की बात रही।

चार दशकों की  साधना
डॉ. रस्तोगी का वैज्ञानिक जीवन चार दशकों से अधिक का रहा। CDRI में वे बायोकेमिस्ट्री विभागाध्यक्ष और डायरेक्टर-ग्रेड वैज्ञानिक तक पहुंचे और 2003 में सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने लगभग 100 शोध पत्र प्रकाशित किए और अनेक पीएचडी व मेडिकल छात्रों का मार्गदर्शन किया। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंडिया के फेलो चुना जाना और CDRI के प्रतिष्ठित पूर्व छात्र के रूप में सम्मानित होना, भारतीय विज्ञान में उनके योगदान की पुष्टि करता है।

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रंगमंच और सिनेमा में छह दशकों का सफर
विज्ञान के समानांतर डॉ. रस्तोगी की कला यात्रा भी असाधारण रही। पिछले 60 वर्षों से अधिक समय में उन्होंने मंच, रेडियो, टेलीविजन और सिनेमा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 100 से अधिक नाटकों में अभिनय,  1,000 से ज्यादा रंगमंच प्रस्तुतियां, 500 से अधिक टीवी एपिसोड और 60–70 फिल्मों व OTT प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। उनकी चर्चित फिल्मों में इश्कजादे, मुक्ति भवन, रेड, मुल्क, आर्टिकल 15, Z प्लस और मिशन रानीगंज शामिल हैं, जिन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली।

लखनऊ रंगमंच के ‘भीष्म पितामह’
डॉ. रस्तोगी को अक्सर लखनऊ रंगमंच का ‘भीष्म पितामह’ कहा जाता है। थिएटर समूह ‘दर्पण’ से जुड़े रहते हुए उन्होंने अंधा युग, मुद्राराक्षस, खामोश अदालत जारी है और पक्षी जा पक्षी आ जैसे ऐतिहासिक नाटकों को मंच पर जीवंत किया। पक्षी जा पक्षी आ तो लगभग दो दशकों तक देशभर में खेला गया—उस दौर में जब रंगमंच संसाधनों से नहीं, जुनून से चलता था।
उनकी कला साधना को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, यश भारती, कालिदास सम्मान और कई लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड्स से नवाजा गया।

सेवा ही साधना
डॉ. रस्तोगी की पहचान केवल विज्ञान और कला तक सीमित नहीं है। बीते करीब 30 वर्षों से वे अपने भाई के साथ लखनऊ में हरि ओम सेवा केंद्र चला रहे हैं, जहां जरूरतमंदों को जीवनरक्षक इंजेक्शन, रक्त आधान, एंबुलेंस सेवा और डायलिसिस किट जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

लखनऊ और CDRI से गहरा जुड़ाव
डॉ. रस्तोगी अपनी यात्रा का श्रेय CDRI और लखनऊ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को देते हैं। पद्मश्री सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों की मान्यता है, बल्कि उस जीवन दर्शन का भी उत्सव है, जहां विज्ञान, कला और करुणा एक साथ समाज को दिशा देते हैं।

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