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ट्रंप की इमिग्रेशन नीति से इनोवेशन को नुकसान : विशेषज्ञ

विवेक वाधावा ने कहा, "मुझे यहां न टैलेंट मिला, न फंडिंग।" निवेशक ऐसे प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने से हिचक रहे थे जिनका रिसर्च और डेवलपमेंट अमेरिका के बाहर हो।

सिलिकॉन वैली स्थित आव्रजन विशेषज्ञ विवेक वाधवा / uscis.gov

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त इमिग्रेशन नीतियों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सिलिकॉन वैली के इमिग्रेशन विशेषज्ञ विवेक वाधवा का कहना है कि इन नीतियों की वजह से अमेरिका अपनी प्रतिभा और नवाचार खो रहा है, जबकि भारत इसका बड़ा फायदा उठा रहा है। 

सिलिकॉन वैली में लंबे समय से काम कर रहे विवेक वाधवा ने आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका अब सबसे बेहतर और प्रतिभाशाली लोगों को खुद ही दूर भगा रहा है। ये पिछड़ी हुई इमिग्रेशन नीतियां अमेरिका को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं।

विवेक वाधवा लंबे समय से अमेरिकी इनोवेशन में प्रवासियों की भूमिका पर रिसर्च कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले सिलिकॉन वैली में करीब आधे स्टार्टअप प्रवासियों द्वारा शुरू किए जाते थे, लेकिन पिछले एक दशक में यह आंकड़ा गिरकर 40 से 44 प्रतिशत तक आ गया है और अब यह संभवतः 30 प्रतिशत के आसपास या उससे भी कम रह गया है।

उन्होंने अपने अनुभव का उदाहरण देते हुए बताया कि जब उन्होंने सिलिकॉन वैली में मेडिकल डायग्नोस्टिक कंपनी शुरू करने की कोशिश की, तो उन्हें न तो पर्याप्त प्रतिभा मिली और न ही निवेश।

विवेक वाधावा ने कहा, "मुझे यहां न टैलेंट मिला, न फंडिंग।" निवेशक ऐसे प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने से हिचक रहे थे जिनका रिसर्च और डेवलपमेंट अमेरिका के बाहर हो।

इसके बाद विवेक वाधवा ने अपनी कंपनी का काम भारत शिफ्ट कर दिया, जहां उन्होंने आईआईटी मद्रास और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे संस्थानों के साथ काम किया। उनका दावा है कि सिर्फ एक साल में वहां ऐसे ब्रेकथ्रू हुए, जो अमेरिका में संभव नहीं लगते थे।

विवेक वाधवा ने कहा कि भारत में आज भी ऐसे विशेषज्ञों की अच्छी संख्या है जो थर्मोडायनामिक्स, प्लाज्मा फिजिक्स, केमिस्ट्री और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग जैसे विषयों की गहरी समझ रखते हैं। इसके उलट, उन्होंने अमेरिकी स्टार्टअप इकोसिस्टम में इस तरह की प्रतिभा की कमी की बात कही।

उन्होंने एच-1बी वीजा प्रक्रिया को भी बड़ी समस्या बताया। विवेक वाधवा ने कहा कि इस बैकलॉग और जटिल प्रक्रिया के चलते मैं वह टैलेंट अमेरिका नहीं ला सका, जिसकी मुझे जरूरत थी। ग्रीन कार्ड मिलने में लंबा समय भी प्रवासियों के लिए बड़ी चिंता है। उन्होंने सवाल उठाया, "लोग हमेशा डर में रहते हैं कि उन्हें कभी भी बाहर किया जा सकता है, ऐसे में कौन यहां आना चाहेगा?"

विवेक वाधवा ने अपने 1980 के दशक के अनुभव से तुलना करते हुए कहा, "जब मैं अमेरिका आया था, तो मुझे 18 महीने में ग्रीन कार्ड मिल गया था। आज यही प्रक्रिया सालों खिंच सकती है।"

उन्होंने चेतावनी दी कि इसका असर सिर्फ इमिग्रेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि इनोवेशन पर भी पड़ रहा है। इनोवेशन अब ग्लोबल हो चुका है। अगर आप लोगों को रोकेंगे, तो इनोवेशन भी रुक जाएगा।

विवेक वाधवा की कंपनी अब अपनी तकनीक को पहले भारत में टेस्ट करेगी और उसके बाद ही अमेरिका में लाएगी। यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर इनोवेशन का केंद्र धीरे-धीरे बदल रहा है।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिका में इमिग्रेशन सुधार और तकनीकी नेतृत्व बनाए रखने में विदेशी प्रतिभाओं की भूमिका पर गंभीर चर्चा चल रही है।
 

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