विनोद कुमार शुक्ल / Wikipedia
प्रख्यात हिंदी साहित्यकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार को 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे रायपुर स्थित एम्स (AIIMS) में उपचाराधीन थे। शाम 4:48 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। डॉक्टरों के अनुसार वे मल्टीपल ऑर्गन इंफेक्शन से जूझ रहे थे।
विनोद कुमार शुक्ल को 2 दिसंबर को सांस लेने में तकलीफ के चलते एम्स रायपुर में भर्ती कराया गया था। उनकी हालत गंभीर होने पर उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट और वेंटिलेटर पर रखा गया था। उनका अंतिम संस्कार बुधवार सुबह 11 बजे रायपुर के मारवाड़ी मुक्तिधाम में किया गया। उनके परिवार में पत्नी, पुत्र शाश्वत और एक पुत्री हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “प्रसिद्ध साहित्यकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन से अत्यंत दुःख हुआ। हिंदी साहित्य की दुनिया में उनके अमूल्य योगदान को सदैव याद किया जाएगा। इस दुःख की घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।”
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1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल ने पेशे से शिक्षक रहते हुए अपना जीवन साहित्य सृजन को समर्पित किया। उनकी पहली कविता ‘लगभग जयहिंद’ वर्ष 1971 में प्रकाशित हुई, जिसने उनके साहित्यिक सफर की मजबूत नींव रखी।
उनके प्रमुख उपन्यासों में ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘नौकर की कमीज़’ और ‘खिलेगा तो देखेंगे’ शामिल हैं। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मणि कौल ने उनके उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ पर 1979 में फिल्म का निर्माण किया था। वहीं ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
विनोद कुमार शुक्ल की लेखन शैली अपनी सहजता, सरलता और प्रयोगधर्मिता के लिए जानी जाती है। वे साधारण जीवन के अनुभवों को गहन संवेदनाओं और विचारों के साथ साहित्य में पिरोने में माहिर थे। उनकी रचनाओं ने भारतीय साहित्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के साथ-साथ पाठकों के भीतर नई चेतना जगाई।
वर्ष 2024 में उन्हें 59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। वे यह सम्मान पाने वाले छत्तीसगढ़ के पहले साहित्यकार और हिंदी भाषा के 12वें लेखक थे।
हिंदी साहित्य में विनोद कुमार शुक्ल का योगदान, उनकी सृजनात्मकता और उनकी विशिष्ट साहित्यिक आवाज़ सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगी। उनका निधन एक युग के अंत जैसा है, लेकिन उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेंगी।
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