भारत और रूस के कारोबारियों में वार्ता / IANS/PMO
पिछले हफ्ते मॉस्को में भारतीय और रूसी कारोबारी नेताओं तथा सरकारी अधिकारियों के बीच हुई बैठक को मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के दौर में दोनों देशों के बीच स्थिर रिश्ते बनाए रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
इस कारोबारी संवाद की जमीन दिसंबर में दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई शिखर वार्ता से तैयार हुई थी।
दक्षिण अफ्रीका की न्यूज वेबसाइट इंडिपेंडेंट ऑनलाइन (IOL) में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, “रूस के लिए भारत के साथ साझेदारी उसकी उस रणनीति का अहम हिस्सा है, जिसके तहत वह आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बावजूद खुद को एक महाशक्ति के रूप में बनाए रखना चाहता है।”
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लेख में कहा गया है कि दुनिया की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद के चलते भारत, रूस के लिए एक तरह से “आर्थिक जीवनरेखा” बन गया है।
बैठक में निवेश बढ़ाने, नए वित्तीय साधनों के विकास और संयुक्त परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर फोकस किया गया।
लेख में यह भी उल्लेख है कि जहां रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा एक प्रतिबंधित देश है, वहीं भारत पर अमेरिका की ओर से रूसी तेल की खरीद जारी रखने पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी है। इसके अलावा पश्चिमी यूरोप की ओर से भी भारत पर रूसी तेल न खरीदने का कूटनीतिक दबाव है।
लेख के मुताबिक युद्ध, आर्थिक दबाव और क्षेत्रीय असुरक्षा का यह संगम भारत-रूस संबंधों को आज दुनिया के सबसे अहम रिश्तों में से एक बनाता है।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत का मजबूत घरेलू बाजार पश्चिमी देशों से गहराई से जुड़ा है। अमेरिका और यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े कारोबारी साझेदार हैं और निवेश, तकनीक व वित्तीय बाजारों तक पहुंच के प्रमुख स्रोत भी हैं, जो भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देते हैं।
इसके अलावा, अमेरिकी सप्लाई चेन चीन के विकल्प के तौर पर भारत की ओर देख रही हैं, ताकि लोकतांत्रिक देश की युवा आबादी का लाभ उठाया जा सके और भारत को दुनिया का अगला मैन्युफैक्चरिंग हब बनाया जा सके।
लेख के अनुसार, भारत को रूस के साथ अपने रिश्तों में बेहद संतुलन बनाकर चलना होगा, क्योंकि किसी भी तरह के पश्चिमी प्रतिबंध देश में व्यापार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को प्रभावित कर सकते हैं, ऐसे समय में जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है।
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