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भारत में खाना पकाने का ईंधन ले रहा छोटे बच्चों की जान, कॉर्नेल की रिपोर्ट में खुलासा

शोधकर्ताओं ने 1992 से 2016 तक के घरेलू सर्वेक्षण डेटा के आकलन करके पाया कि खाना पकाने के लिए गंदे ईंधन के इस्तेमाल का एक महीने से कम उम्र के शिशुओं पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ता है।

दुनिया की लगभग एक तिहाई आबादी खुली आग पर या बायोमास ईंधन से खाना पकाती है। / representative image : unsplash

वायु प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति दुनिया में पहले से ही खराब है। अब एक नई रिसर्च रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में हर 1,000 शिशुओं और बच्चों में से 27 की मौत खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले गंदे ईंधन के संपर्क में आने से होती है। यह रिपोर्ट कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की तरफ से किए गए शोध के आधार पर तैयार की गई है। 

2023 में जारी छठी वार्षिक विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण के लिहाज से दुनिया के सबसे खराब 100 शहरों में से 83 भारत में हैं। इन सभी में विश्व स्वास्थ्य संगठन के वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों की तुलना में प्रदूषण का स्तर 10 गुना से भी अधिक था।

पर्यावरण संरक्षण एजेंसी और अन्य संगठनों का सुझाव है कि बाहरी वायु प्रदूषण के साथ ही घरों के अंदर हवा की खराब क्वालिटी बेहद घातक साबित हो रही है क्योंकि इन्हीं जगहों पर ज्यादातर लोग अपना अधिकांश समय बिताते हैं।

चार्ल्स एच. डायसन स्कूल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक्स एंड मैनेजमेंट के प्रोफेसर और 'कुकिंग फ्यूल चॉइस एंड चाइल्ड मोर्टेलिटी इन इंडिया' के पहले लेखक अर्नब बसु ने बताया कि यह पहला रिसर्च पेपर है जो घरों के अंदर बायोमास ईंधनों के उपयोग से होने वाले नुकसान और युवाओं को जोखिम का मजबूत अनुमान देता है। 

हाल ही में जर्नल ऑफ इकोनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गनाइजेशन में प्रकाशित इस रिसर्च के बारे में बसु ने बताया कि हमने 25 वर्षों के राष्ट्रीय जनसांख्यिकीय एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण डेटा का उपयोग करके ये निष्कर्ष निकाला है। इस व्यापक डेटा की मदद से हम घरों में उपयोग होने वाले सभी प्रकार के प्रदूषणकारी ईंधन की पहचान करने में सक्षम हुए हैं। 

शोधकर्ताओं ने 1992 से 2016 तक के घरेलू सर्वेक्षण डेटा के आकलन करके पाया कि खाना पकाने के लिए गंदे ईंधन के इस्तेमाल का एक महीने से कम उम्र के शिशुओं पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ता है। इस उम्र में फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते हैं और शिशु अपनी मां के सबसे करीब रहते हैं, जो रसोई में काफी वक्त बिताती हैं।

बसु ने कहा कि दिलचस्प बात यह है कि भारतीय घरों में लड़कों की तुलना में युवा लड़कियों में मृत्यु दर बहुत अधिक है। ऐसा इसलिए नहीं कि लड़कियां प्रदूषण से संबंधित सांस संबंधी बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। 

उन्होंने कहा कि इसका एक कारण ये भी है कि भारत में आमतौर पर बेटों को प्राथमिकता दी जाती है और जब बेटी बीमार पड़ती है या खांसती है तो उसके इलाज पर कम ध्यान दिया जाता है। बसु ने कहा कि स्वच्छ ईंधन अपनाने से न सिर्फ बच्चों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा बल्कि बेटियों की इस उपेक्षा को भी दूर किया जा सकता है। 

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनिया की लगभग एक तिहाई आबादी खुली आग पर या लकड़ी, पशु गोबर और फसल अपशिष्ट जैसे बायोमास ईंधन से खाना पकाती है। इसकी वजह से दुनिया भर में हर साल अनुमानित 32 करोड लोगों की मौत होती है।

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