घृणा-विरोध अधिनियम / X/ @JohnPaulDanko
कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स ने 25 मार्च को 'कॉम्बैटिंग हेट एक्ट' (नफरत से लड़ने वाला कानून) पास कर दिया। यह एक ऐसा बिल है जो नफरत फैलाने वाले प्रचार, नफरत की भावना से किए गए अपराधों, और धार्मिक व सांस्कृतिक जगहों पर रुकावट डालने या डराने-धमकाने से जुड़े नए आपराधिक मामले बनाएगा।
बिल C-9 तीसरी रीडिंग में पास हो गया। इसे कनाडा की संघीय संसद में क्यूबेक-आधारित पार्टी, 'ब्लॉक क्यूबेकोइस' का समर्थन मिला, जबकि 'कंज़र्वेटिव पार्टी' और 'न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी' ने इसके खिलाफ वोट दिया।
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न्याय मंत्री शॉन फ्रेजर द्वारा पेश किया गया यह लिबरल सरकार का बिल, कनाडा के 'क्रिमिनल कोड' (आपराधिक संहिता) में संशोधन करता है। इसका मकसद कुछ खास तरह के आतंकवाद या नफ़रत से जुड़े प्रतीकों के ज़रिए नफ़रत फैलाने को अपराध घोषित करना है। साथ ही, यह पूजा स्थलों और अन्य सामुदायिक संस्थानों तक पहुंचने में रुकावट डालने, डराने-धमकाने या दखल देने वालों के खिलाफ नए अपराधों को परिभाषित करता है। यह एक नया 'हेट क्राइम' (नफरत से जुड़ा अपराध) भी पेश करता है, जिसके तहत अगर किसी अपराध के पीछे नफरत की भावना हो, तो उसकी सज़ा बढ़ा दी जाती है।
इस घटनाक्रम की घोषणा करते हुए, प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने X पर एक पोस्ट में कहा, कि इस सप्ताह हाउस ऑफ कॉमन्स में 'कॉम्बैटिंग हेट एक्ट' पास हो गया। यह एक मजबूत और सुरक्षित देश बनाने के हमारे मिशन में एक बहुत बड़ा कदम है। ऐसा देश जहां हर कोई, चाहे वह कोई भी हो या किसी भी तरह से पूजा करता हो, हिंसा और डर से मुक्त होकर जी सके।
यह बिल अटॉर्नी जनरल से मंज़ूरी लेने की उस शर्त को भी हटा देता है, जिसके बिना सरकारी वकील नफ़रत फैलाने वाले प्रचार से जुड़े कुछ खास मामलों में आगे नहीं बढ़ सकते थे।
यह कानून राजनीतिक रूप से काफ़ी विवादित रहा है। लिबरल सरकार ने कनाडा के 'हेट स्पीच' (नफरत फैलाने वाले भाषण) कानून में मौजूद एक धार्मिक छूट को हटाने पर सहमति जताकर 'ब्लॉक' पार्टी का समर्थन हासिल किया। यह छूट अभी तक धार्मिक विषयों पर 'सद्भावना' (अच्छी नीयत) से दिए गए बयानों को सुरक्षा प्रदान करती थी।
न्याय मंत्री शॉन फ्रेजर ने इस बदलाव का बचाव करते हुए कहा कि यह 'आस्था को अपराध नहीं बनाएगा।' कंजर्वेटिव सांसदों ने इस संशोधन का विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर एक 'हमला' बताया, जबकि कई धार्मिक समूहों ने भी इस बात पर चिंता जताई कि इसका स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर क्या असर पड़ेगा।
इस बिल ने भारत-कनाडाई समुदाय के कुछ वर्गों का भी ध्यान खींचा है। खासकर, खालिस्तानी अलगाववादी गतिविधियों को लेकर चल रहे तनाव और प्रतिबंधित समूहों से जुड़े तोड़-फोड़, डराने-धमकाने और सार्वजनिक प्रदर्शनों की घटनाओं के संदर्भ में।
समुदाय के कुछ सदस्यों ने इस कानून को एक ऐसा कदम बताया है जिसका वे लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। खासकर इसलिए, क्योंकि इसमें नफ़रत से जुड़े प्रतीकों और पूजा स्थलों तक पहुंच से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। बिल C-9 को 19 सितंबर, 2025 को पेश किया गया था, और समीक्षा के लिए संसदीय न्याय समिति को भेजे जाने से पहले, 1 अक्टूबर, 2025 को हाउस ऑफ कॉमन्स में दूसरे मतदान में पारित कर दिया गया। समिति ने 13 मार्च को संशोधनों के साथ बिल वापस भेज दिया। 23 मार्च को यह रिपोर्ट चरण से आगे बढ़ गया, और इसके दो दिन बाद तीसरी रीडिंग में भी पारित हो गया।
अब यह बिल कनाडा की सीनेट- संसद के ऊपरी सदन- में जाएगा, और कानून बनने से पहले इसे 'शाही सहमति' प्राप्त करना अनिवार्य होगा।
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