बांग्लादेश में चुनाव से पहले कानून व्यवस्था पर सवाल / IANS
बांग्लादेश में आगामी चुनाव से पहले देश की कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। अगस्त 2024 के बाद से देश में भीड़ हिंसा, जबरन वसूली, लूटपाट और अन्य आपराधिक घटनाओं में तेज़ी से इज़ाफा हुआ है, जबकि इन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं दिख रहा है। यह बात एक रिपोर्ट में सामने आई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2024 में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के सत्ता में आने के बाद भी पुलिसकर्मियों पर भीड़ के हमले लगातार जारी हैं। इन हमलों में कई पुलिसकर्मी हताहत हुए हैं, जिससे सुरक्षा बलों के बीच भय और मानसिक तनाव का माहौल बन गया है।
बांग्लादेश के प्रमुख अख़बार डेली सन की रिपोर्ट में कहा गया है कि रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) — जो कभी आम नागरिकों के लिए भरोसे और अपराधियों के लिए खौफ का प्रतीक मानी जाती थी — अब पहले जैसी प्रभावी नहीं रही। आतंकवादियों, जबरन वसूली करने वालों और नशा तस्करों पर इसका वह डर अब नजर नहीं आता।
रिपोर्ट में बताया गया कि विभिन्न विवादों के चलते RAB की गतिविधियां काफी हद तक सीमित हो गई हैं। जबरन गायब किए जाने से जुड़े मामलों की जांच कर रही आयोग और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों द्वारा RAB को भंग करने की सिफारिशों के बाद इस बल के जवानों में भारी निराशा है। कई कर्मी इस आशंका में हैं कि भविष्य में RAB में सेवा करना उनके लिए कानूनी या व्यक्तिगत समस्याएं खड़ी कर सकता है।
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रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि कुछ व्यक्तियों के कथित अपराधों के आधार पर पूरे बल को दोषी ठहराना गलत है। बीते डेढ़ साल में प्रभावशाली वर्गों की आलोचना ने पूरे बल को कमजोर कर दिया है, जिससे अपराधियों में RAB का खौफ लगभग खत्म हो गया है।
आंकड़ों के अनुसार, पुलिस पर हमलों और उत्पीड़न के 500 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं, हालांकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 5 अगस्त 2024 के बाद जेल से रिहा किए गए कई कुख्यात अपराधी फिर से सक्रिय हो गए हैं और फरवरी में होने वाले चुनाव से पहले उन्हें राजनीतिक संरक्षण भी मिल रहा है।
12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव के लिए प्रचार अभियान शुरू हो चुका है। ऐसे में रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि इतनी कमजोर कानून-व्यवस्था के बीच चुनावी प्रक्रिया कितनी शांतिपूर्ण रह पाएगी। आम जनता भय, चिंता और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कानून-व्यवस्था सुधारने का कोई त्वरित समाधान नहीं है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है और बीते डेढ़ साल में उठाए गए कदम कितने प्रभावी रहे हैं, यह संदेह के घेरे में है।
अख़बार ने लिखा है कि शक्तिशाली हितों के संरक्षण में भीड़, आतंकवादी और जबरन वसूली करने वाले “राक्षस” बन चुके हैं और कई मामलों में अपराधियों को सजा नहीं मिली है। ऐसे में यह मानने का कोई कारण नहीं है कि चुनाव से पहले आतंकवादी अचानक सुधर जाएंगे, बल्कि आशंका है कि वे और भी ज़्यादा खतरनाक हो सकते हैं।
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