पीएम मोदी / IANS/Video Grab
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक कूटनीति में एक ऐसे नेता के रूप में उभर रहे हैं, जो रूस और यूरोप के बीच सेतु (ब्रिज बिल्डर) की भूमिका निभा सकते हैं। यूरोप के मॉस्को के प्रति रुख में बदलाव के संकेतों के बीच यह भूमिका अब और अधिक प्रासंगिक होती नजर आ रही है। मॉस्को स्थित पोर्टल ‘जियोपोलिटिका’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बात को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, विरोधी पक्षों के बीच संवाद को बढ़ावा देने और सैन्य विकल्पों से दूर रहने की पीएम मोदी की नीति दिसंबर में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान खास तौर पर सामने आई। इस दौरान पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा था—
“भारत तटस्थ नहीं है, भारत का एक स्पष्ट पक्ष है और वह पक्ष शांति का है। हम शांति के हर प्रयास का समर्थन करते हैं और शांति के लिए उठाए गए हर कदम में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।”
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ अतुल अनेजा के अनुसार, पीएम मोदी का यह दृष्टिकोण—जिसमें यूक्रेन सहित वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए एकमत अंतरराष्ट्रीय राय बनाने पर जोर है—भारत को वैश्विक मतभेदों के बीच एक ब्रिज नेशन के रूप में स्थापित करता है।
रिपोर्ट में बताया गया कि भारत यात्रा के तुरंत बाद जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ के रुख में बड़ा बदलाव देखने को मिला। गुजरात में पीएम मोदी द्वारा गर्मजोशी से स्वागत के बाद, मर्ज़ ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन से बातचीत की इच्छा जताई।
‘जियोपोलिटिका’ के अनुसार, “यह एक नाटकीय बदलाव था। सत्ता संभालने के बाद रूस की कड़ी आलोचना करने वाले मर्ज़ ने 16 जनवरी को एक नीति भाषण में कहा कि यूक्रेन में शांति समझौता ‘रूस की सहमति के बिना संभव नहीं है’।”
इतना ही नहीं, एक आर्थिक सम्मेलन में मर्ज़ ने कहा कि यूरोपीय संघ को अपने “सबसे बड़े यूरोपीय पड़ोसी” रूस के साथ फिर से संतुलन बनाना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर शांति होती है, तो 2026 के बाद भविष्य को लेकर भरोसे के साथ आगे देखा जा सकता है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी भी इसी तरह की सोच के संकेत दे रहे हैं, जिससे यूरोप में रूस के साथ संवाद को लेकर नई सहमति बनती दिख रही है।
जर्मन चांसलर मर्ज़ की भारत यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने साफ तौर पर शांति वार्ता के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने की अपील की थी। अतुल अनेजा लिखते हैं कि यह यूरोपीय और एशियाई दृष्टिकोणों के बीच पुल बनाने की रणनीति थी, जिसे आने वाले महीनों में भारत-यूरोप संबंधों में और मजबूत किया जाएगा।
यह कूटनीतिक पहल ऐसे समय में सामने आ रही है, जब भारत यूरोप के साथ गहरे संबंध चाहता है, ताकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से असमान व्यापार समझौते को लेकर बनाए जा रहे दबाव का संतुलन किया जा सके।
आगामी गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय संघ के नेताओं के मुख्य अतिथि के रूप में भारत आने और फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों के इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट के लिए नई दिल्ली आने के प्रस्तावित दौरे के बीच, पीएम मोदी की भूमिका एक अंतरराष्ट्रीय सेतु निर्माता के रूप में और मजबूत होने की उम्मीद है।
‘जियोपोलिटिका’ ने निष्कर्ष में कहा कि पीएम मोदी की रणनीतिक सोच—जिसमें भारत को पूर्व-पश्चिम और ग्लोबल नॉर्थ-ग्लोबल साउथ के बीच सेतु के रूप में देखने की परिकल्पना है—अब पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट रूप में सामने आ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, पीएम मोदी के विश्वदृष्टिकोण में भारत एक बहुध्रुवीय दुनिया का एक स्वतंत्र ध्रुव है और इसी वजह से वह रूस सहित वैश्विक शक्ति केंद्रों से संवाद कर अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाने का हकदार है।
न्यू इंडिया अब्रॉड की अन्य खबरों को पढ़ने के लिए क्लिक करें।
ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT
Comments
Start the conversation
Become a member of New India Abroad to start commenting.
Sign Up Now
Already have an account? Login