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‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’: वैवाहिक विवाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने FIR की रद्द

इन्हीं आधारों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एफआईआर और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट / file photo

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कहा है कि क्रूरता और विश्वासघात के आरोप “अस्पष्ट, सामान्य और एकतरफा” हैं तथा यह कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान है। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने पति और उसके पिता की याचिका स्वीकार करते हुए हौज खास थाने में पत्नी की शिकायत पर दर्ज IPC की धारा 498A, 406 और 34 के तहत एफआईआर को निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया भी स्वीकार कर लिया जाए, तो वे धारा 498A IPC के तहत “क्रूरता” की कानूनी परिभाषा को पूरा नहीं करते। न्यायालय ने टिप्पणी की, “ये आरोप अधिकतम सामान्य वैवाहिक कलह को दर्शाते हैं, न कि आपराधिक क्रूरता को।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत में ऐसा कोई ठोस आचरण नहीं बताया गया है, जिससे महिला को आत्महत्या के लिए उकसाया गया हो या उसके जीवन, अंग अथवा स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुंची हो।

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आदेश में कहा गया कि शिकायत में तारीख, समय और प्रत्येक आरोपी की विशिष्ट भूमिका का कोई उल्लेख नहीं है। “शिकायत में आरोप अस्पष्ट, सामान्य और बिना किसी ठोस विवरण के हैं,” कोर्ट ने कहा। 

घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत पहले से चल रही कार्यवाही का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति कृष्णा ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पहले ही ससुराल पक्ष के खिलाफ लगाए गए अधिकांश आरोपों को अविश्वसनीय माना था। ऐसे में उन्हीं आरोपों को दोबारा आपराधिक मुकदमे में दोहराना, जहां सबूत का स्तर और कठोर होता है, उचित नहीं है।

धारा 406 IPC के तहत गहनों के कथित गबन के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि पति या ससुर के पास महिला के गहनों का कब्जा या नियंत्रण था। कोर्ट ने कहा, “शिकायत में यह तक नहीं बताया गया कि याचिकाकर्ताओं के पास गहनों की कोई कस्टडी या नियंत्रण था।”

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि एफआईआर कई वर्षों की देरी के बाद दर्ज की गई, जिसकी कोई संतोषजनक वजह नहीं बताई गई। कोर्ट ने इसे चल रहे वैवाहिक और सिविल विवादों के बीच दबाव बनाने की रणनीति करार दिया। न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्याय प्रणाली के दुरुपयोग के समान होगा और यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए उन मानकों में आता है, जिनके तहत धारा 498A जैसे मामलों में एफआईआर रद्द की जा सकती है।

 

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