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मॉडल माइनॉरिटी मिथक क्या है और यह भारतीय-अमेरिकियों पर कैसे डाल रहा असर

मॉडल माइनॉरिटी मिथक उपलब्धि के बदले अपनापन देने का वादा करता है। लेकिन असली अपनापन तब शुरू होता है, जब सफलता एक पिंजरा नहीं रह जाती और सिर्फ इंसान होना ही काफी हो जाता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर / pexels

मॉडल माइनॉरिटी मिथक वह धारणा है, जिसके तहत कुछ अल्पसंख्यक समुदायों खासकर एशियाई और भारतीय अमेरिकियों को यह कहकर पेश किया जाता है कि वे अपनी बेहतर संस्कृति, मूल्यों और कड़ी मेहनत के कारण सफल होते हैं। यह मिथक यह संकेत देता है कि केवल मेहनत से ही नस्लवाद और असमानता जैसी बाधाओं को पार किया जा सकता है। लेकिन गहराई से देखने पर यह तर्क कमजोर पड़ जाता है।

वास्तव में, कई भारतीय प्रवासी अमेरिका में अत्यंत चयनात्मक रास्तों से आते हैं, जैसे स्किल्ड वर्कर वीज़ा, जहां पहले ही शिक्षा, भाषा और सामाजिक वर्ग के आधार पर छनाई हो चुकी होती है। उनकी सफलता को यह साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि सिस्टम में कोई खामी नहीं है। इसका नतीजा यह होता है कि अगर कुछ अल्पसंख्यक आगे बढ़ रहे हैं, तो पीछे रह जाना व्यक्तिगत असफलता मान लिया जाता है, न कि संरचनात्मक असमानता का परिणाम। इससे हाशिए पर मौजूद समुदायों के बीच एक झूठी श्रेष्ठता-हीनता की श्रेणी बन जाती है।

जब मिथक निजी जीवन पर हावी हो जाता है
समय के साथ लोग इस सोच को खुद के भीतर आत्मसात कर लेते हैं। अच्छे नंबर, नामी यूनिवर्सिटी, टेक जॉब और ऊंची सैलरी सिर्फ लक्ष्य नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच बन जाते हैं। खासकर H-1B वीज़ा पर रहने वालों के लिए दबाव कहीं ज्यादा होता है। इस वीज़ा में नौकरी जाना सिर्फ रोजगार खोना नहीं, बल्कि देश छोड़ने की नौबत भी हो सकती है।
इस डर के चलते कई लोग अत्यधिक काम, भेदभाव और अन्याय को चुपचाप सहते रहते हैं। विरोध करना जोखिम भरा लगता है। चुप्पी को पेशेवर व्यवहार मान लिया जाता है और असफलता सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि कानूनी और सामाजिक खतरे के रूप में देखी जाती है।

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समुदाय के भीतर भी मौजूद हैं दर्जे और दबाव
यह दबाव सिर्फ बाहरी समाज से नहीं आता, बल्कि अपने समुदाय के भीतर भी गहराई से मौजूद है। भारतीय-अमेरिकी परिवारों में सफलता को अक्सर व्यक्ति की कीमत से जोड़कर देखा जाता है। कॉलेज, कंपनी, सैलरी, वीज़ा स्टेटस, ग्रीन कार्ड और शादी को लेकर लगातार तुलना होती रहती है। सवाल जैसे “क्या करते हो?” या “H-1B पर हो या ग्रीन कार्ड पर?” अनजाने में सामाजिक दर्जा तय कर देते हैं। प्रवास के बावजूद वर्ग, रंगभेद और क्षेत्रीय भेदभाव जैसी पुरानी संरचनाएं खत्म नहीं होतीं।

‘हमेशा असाधारण’ होने की भावनात्मक कीमत
हमेशा असाधारण बने रहने का दबाव बेहद थकाने वाला होता है। बाहर से सफल दिखने वाले कई भारतीय-अमेरिकी बर्नआउट, चिंता और मानसिक तनाव से जूझते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना अक्सर कमजोरी या कृतघ्नता समझ लिया जाता है। H-1B वीज़ा धारकों के लिए यह बोझ और भारी है—लंबे काम के घंटे, लगातार प्रदर्शन का दबाव और छंटनी का डर भावनात्मक अस्थिरता पैदा करता है।

क्यों कायम है यह मिथक
मॉडल माइनॉरिटी मिथक इसलिए भी बना रहता है क्योंकि यह संस्थागत रूप से सुविधाजनक है। कुछ चुनिंदा सफल उदाहरणों को सामने रखकर सरकारें और संस्थाएं संरचनात्मक नस्लवाद पर सवालों से बच जाती हैं। यह मिथक अन्य हाशिए के समुदायों के संघर्षों को भी कमजोर करने के लिए इस्तेमाल होता है, मानो असमानता मेहनत की कमी का नतीजा हो।

आगे का रास्ता
इस मिथक को चुनौती देने का मतलब मेहनत या महत्वाकांक्षा को नकारना नहीं है। लेकिन सफलता की परिभाषा सिर्फ करियर और कमाई तक सीमित नहीं होनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आराम, रचनात्मकता और नैतिकता भी उतनी ही जरूरी हैं।

सबसे अहम सवाल यह है कि हम अगली पीढ़ी को क्या सिखा रहे हैं—क्या हम उन्हें परफेक्शन के जरिए सुरक्षा खोजने को कह रहे हैं, या एक मानवीय, ईमानदार और अर्थपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा दे रहे हैं?

 

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