भारतीय अमेरिकी। / pexels
साल 2024 की शुरुआत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भारतीय मूल के टेक वर्कर्स को निशाना बनाकर इस्तेमाल की गई आपत्तिजनक नस्लवादी भाषा ने कुछ समय के लिए ट्रेंड किया। “H-1B कूली” और “करी-कोडेड CEO” जैसे शब्दों को व्यंग्य, आर्थिक आलोचना या डार्क ह्यूमर बताकर पेश किया गया। लेकिन चिंता की बात यह रही कि यह भाषा किसी हाशिये के मंच तक सीमित नहीं थी, बल्कि ब्लू-चेक अकाउंट्स, लोकप्रिय पॉडकास्टर्स और राजनीतिक टिप्पणीकारों द्वारा खुले तौर पर इस्तेमाल की गई और एल्गोरिदम के जरिए बड़े पैमाने पर फैल गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीयों के खिलाफ नस्लवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन पहली बार यह इतनी खुली और सामान्यीकृत शक्ल में मुख्यधारा की डिजिटल स्पेस में दिखा है। पोस्ट-9/11 दौर से लेकर कार्यस्थलों पर भेदभाव तक, भारतीय प्रवासी दशकों से भेदभाव का सामना करते रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह नफरत हाशिये से निकलकर मेनस्ट्रीम फीड में पहुंच गई है।
क्यों बढ़ रहा है यह विरोध?
विश्लेषकों के अनुसार, इस बदलाव के पीछे तीन बड़े कारण हैं-
एल्गोरिदमिक एम्प्लीफिकेशन
गुस्सा और विवाद सोशल मीडिया पर तेजी से फैलते हैं। भारतीय उच्चारण, भोजन या “टेक पर कब्जे” जैसे विषयों पर मज़ाक ज्यादा एंगेजमेंट लाते हैं, जिसे प्लेटफॉर्म ज्यादा प्रमोट करते हैं।
मीम कल्चर
जब नस्लवाद को व्यंग्य या मज़ाक के रूप में पेश किया जाता है, तो उस पर सवाल उठाना मुश्किल हो जाता है। “यह तो सिर्फ जोक है” एक ढाल बन जाता है।
इन्फ्लुएंसर राजनीति
कुछ प्रभावशाली चेहरे खुद को एलीट-विरोधी या इमिग्रेशन-विरोधी बताकर भारतीय अमेरिकियों को वैश्वीकरण, आउटसोर्सिंग और सस्ते श्रम की चिंताओं का प्रतीक बना रहे हैं।
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राजनीतिक माहौल और H-1B विवाद
अमेरिका में इमिग्रेशन पहले से ही एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। H-1B वीज़ा को नौकरी छीनने के रूप में पेश किया जाता है, जिससे भारतीय टेक वर्कर्स को “प्रतिद्वंद्वी” की तरह देखा जाने लगा है। टेक सेक्टर में छंटनी के बाद यह नाराज़गी और तेज हुई—जब अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां जाती हैं, तो दोष किसे दिया जाए?
इसके साथ ही तथाकथित मेरिटोक्रेसी मिथक भी है—भारतीयों की सफलता को यह कहने के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि अमेरिका में नस्लवाद मौजूद नहीं है, लेकिन वही सफलता बाद में शक और विरोध का कारण बन जाती है।
‘मॉडल माइनॉरिटी’ मिथक का उल्टा असर
भारतीय अमेरिकियों को लंबे समय से “मॉडल माइनॉरिटी” कहा जाता रहा है—पढ़े-लिखे, मेहनती और सफल। लेकिन यह टैग संस्थागत नस्लवाद को छिपाने का काम करता है और दूसरे समुदायों के खिलाफ भी इस्तेमाल होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दिखाई देने वाली सफलता नाराज़गी को जन्म देती है—भारतीय अमेरिकियों को बोर्डरूम में सराहा जाता है, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में उनका मज़ाक उड़ाया जाता है।
ऑनलाइन नफरत, असल दुनिया में असर
कई लोग ऑनलाइन नस्लवाद को सिर्फ शोर मानते हैं, लेकिन इसका असर वास्तविक जीवन में दिखने लगा है। भारतीय अमेरिकी समुदाय में चिंता, डर और असुरक्षा बढ़ी है, खासकर उन लोगों में जो अस्थायी वीज़ा पर हैं। छात्रों को स्कूलों में और पेशेवरों को दफ्तरों में अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है।
सिख, मुस्लिम और हिंदू समुदायों को भी निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि नस्लवाद अक्सर धर्म का फर्क नहीं समझता।
समुदाय के भीतर बहस
भारतीय प्रवासी समुदाय के भीतर इस पर प्रतिक्रियाएं बंटी हुई हैं। कुछ संगठन और युवा नेता खुलकर नस्लवाद के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं और घटनाओं को दस्तावेज़ कर रहे हैं। वहीं, एक वर्ग चुप्पी या सावधानी बरतने के पक्ष में है, खासकर पुरानी पीढ़ी, जो असुरक्षा और “आभार की राजनीति” से प्रभावित रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ रणनीति की नहीं, बल्कि पहचान की बहस है।
बड़ा सवाल
विश्लेषकों के अनुसार, भारतीय अमेरिकी अब एक तरह से परीक्षण का मामला बन गए हैं- क्या आर्थिक सफलता सामाजिक सुरक्षा की गारंटी है? कब और कैसे “स्वीकृति” वापस ली जा सकती है?
यह बहस अभिव्यक्ति की आज़ादी और नफरत, आत्मसात होने और गरिमा, लोकतंत्र और बहिष्कार के बीच की खाई को उजागर करती है। अगर “सफल” माने जाने वाले समुदाय के साथ ऐसा हो सकता है, तो किसी के साथ भी हो सकता है। सवाल यही है—क्या इसे पहचाना जाएगा, चुनौती दी जाएगी और एकजुट होकर सामना किया जाएगा, या तब तक इंतजार होगा जब बारी किसी और की आए?
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