चांद की तस्वीर / pexels
अगर पृथ्वी की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएं किसी पुरानी वेस्टर्न फिल्म जैसी होतीं, तो 1969 का मून लैंडिंग उसका हाई-नून क्लाइमेक्स था। नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज़ एल्ड्रिन चांद की धूल पर कदम रख रहे थे, और अमेरिका व सोवियत संघ टीवी स्क्रीन के सामने इतिहास देख रहे थे।
वह शीत युद्ध की दौड़ का शिखर था-अमेरिकी झंडा गड़ा, तस्वीरें दुनिया भर में पहुंचीं और लगा कि अंतरिक्ष की ट्रॉफी अलमारी भर गई है। लेकिन समय के साथ वह अलमारी खाली-सी महसूस होने लगी। अब, दशकों बाद, ऐसा लगता है जैसे किसी ने अपोलो मिशन का पुराना पन्ना फिर से खोल दिया हो और कहा हो-क्यों न एक बार फिर दौड़ लगाई जाए?
इसी पृष्ठभूमि में डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन का एक्जीक्यूटिव ऑर्डर सामने आता है- “Ensuring American Space Superiority”। इसमें 2028 तक अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को फिर से चाँद पर उतारने और 2030 तक वहाँ एक स्थायी लूनर आउटपोस्ट बनाने का लक्ष्य तय किया गया है।
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और हां! चांद पर और कक्षा में न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने की भी बात है। आखिर अंतरिक्ष में ‘मेहमाननवाज़ी’ का नया अर्थ यही है। आधिकारिक भाषा में यह सब नेतृत्व, खोज, सुरक्षा और समृद्धि की बात है। अनौपचारिक रूप से देखें तो संदेश कुछ यूं भी पढ़ा जा सकता है-“हम पहले पहुंचे थे, अब फिर पहुंचेंगे।”
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