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अनिश्चितता में आशावाद... आपदा में अवसर

इन हालात में भी दोनों ओर एक आशावाद है। आशावाद चीजों के फिर से ठीक हो जाने, पटरी पर आने और साथ कदमताल को लेकर है।

सांकेतिक तस्वीर / Reuters/File

ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में बेहतर दिन देखने की उम्मीद करते-करते बीते छह महीनों में हालात ने ऐसी करवट ली कि भारत पर दुनिया में 'सबसे अधिक' दंडात्मक टैरिफ लागू हो गए। इन छह महीनों में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण एक देश मित्र से 'मोहरा' बन गया। व्यापार को अस्त्र बनाकर युद्धरत देशों को मजबूर करके 'दोस्त' बनाने की ट्रम्प की रणनीति अमेरिका को कितने मित्र देगी और उसे कितना 'महान' बनाएगी यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन इतना तो तय है कि अभी पूरी दुनिया में एक अजीब किस्म की अनिश्चितता है। अनिश्चितता के इस अवसर में भारत आशावाद के कुछ बिंदू तलाश चुका है, कुछ तलाश रहा है। जो उम्मीदें उसे अमेरिका से थीं अब दुनिया के दूसरे देशों के रूप में खोजनी पड़ रही हैं। व्यापार के लिए नए रास्ते और देश देखे जा रहे हैं। ताकि अमेरिका से होने वाले घाटे को पाटा जा सके। कुल मिलाकर जो 'आपदा' आई है भारत उसमें अवसर तलाश कर रहा है। चुनौती से लड़ने का एक अहम जज्बा यह भी होता है। और इतिहास गवाह है कि परमाणु परीक्षण के वक्त अमेरिका की ओर से तल्खी झेल चुका भारत विजेता बनकर निकला।

जहां तक 50 प्रतिशत टैरिफ और उसके असर की बात है तो भारत में इसपर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। इतना सभी मान रहे हैं कि यह झटका बड़ा है, लेकिन साथ ही यह आशावाद भी है कि भारत इससे पार पा सकता है। जिस तरह मंदी जैसे कठिन हालात में भारतीय अर्थव्यवस्था टिकी रही उसी तरह की उम्मीदें इस बार भी लगाई जा रही हैं। कुछ ही साल पहले जब पूरी दुनिया कोविड से जूझते हुए पस्त हुई जा रही थी तो भारत अपने साधन-संसाधनों के दम पर एक नायक की तरह दूसरे देशों की मदद कर रहा था। यानी मुसीबत के वक्त खुद भी खड़ा था और दूसरे देशों को भी सहारा दे रहा था। चुनौती के हालात में खुद संभलना और दूसरों की सहायता करना भारत की पहचान है। और अब जब भारत के सामने एक बार फिर चुनौती की स्थिति है तो भारत उसी जज्बे से खुद को खड़ा करने की जद्दोजहद में है। शायद खुद पर भरोसा और अतीत के अनुभवों से ताकत पाकर ही भारत अपनी कुछ शर्तों पर दृढ़ है, जिसे अमेरिका का एक वर्ग उसका 'अड़ियल' रवैया करार दे रहा है। 

किंतु यकीनन इन हालात में भी दोनों ओर एक आशावाद है। आशावाद चीजों के फिर से ठीक हो जाने, पटरी पर आने और साथ कदमताल का। इसीलिए मोती-ट्रम्प सीधी वार्ता का आग्रह तमाम वर्गों से किया जा रहा है। आग्रह करने वालों में व्यापार जगत के लोग तो हैं ही पूर्व और वर्तमान अधिकारी-मंत्री भी हैं। टैरिफ को लेकर जारी तनाव के बीच अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का कहना है भारत और अमेरिका के रिश्ते काफी जटिल हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प और प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत स्तर पर अच्छे संबंध हैं। ये संबंध रूसी तेल तक सीमित नहीं है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और अमेरिका सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था। मुझे भरोसा है कि आखिर में हम एक साथ आएंगे। कुछ ऐसा ही भाव अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत और राज्यसभा सदस्य हर्षवर्धन श्रृंगला का है। बकौल श्रृंगला दोनों सरकारें एक 'पारस्परिक रूप से लाभकारी मुक्त व्यापार समझौते' पर पहुंचने के प्रति आशान्वित हैं। विश्वास है कि द्विपक्षीय संबंध जल्द ही हाल के वर्षों की उच्च गति प्राप्त कर लेंगे।

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