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प्रवास, नागरिकता और नजरिया

सामाजिक-आर्थिक दरारें लगातार बढ़ रही हैं। सुकून का जीवन दूभर हो रहा है। ऐसे में जो समर्थ है वह तो 'सीमा' पार करेगा ही।

सांकेतिक तस्वीर / Unsplash

डेटा फॉर इंडिया 2025 की रिपोर्ट, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े इस्तेमाल किए गए, बताती है कि भारत अब दुनिया की सबसे बड़ी प्रवासी आबादी वाला देश है जहां वर्ष 2024 तक 1.85 करोड़ भारतीय विदेश में रह रहे थे। यह संख्या या आबादी सभी अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों का लगभग 6 प्रतिशत है। रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि भारतीय कनाडा में सबसे बड़ा प्रवासी समूह हैं और मेक्सिको के बाद अमेरिका में दूसरा सबसे बड़ा प्रवासी वर्ग हैं। उधर, भारत के विदेश राज्यमंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने कुछ ही दिन पहले संसद (राज्यसभा) में बताया है कि साल 2024 में 2 लाख 06 हजार लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ी। यानी इतने लोग भारत छोड़कर दूसरे देशों में जा बसे। बीते कुछ बरसों के आंकड़े देखें तो हम पाते हैं कि भारतीयों का नागरिकता छोड़ने का सिलसिला न सिर्फ जारी है बल्कि उसमें अपवाद छोड़ लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2023 में 2,16, 219 और वर्ष 2022 में कुल 2 लाख 25 हजार लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ी। नागरिकता छोड़ने का क्रम वैश्विक है, इस दृष्टि से भारत का मामला भी कोई अलग नहीं। जिस संख्या में भारतीयों ने अपने देश की नागरिकता छोड़ी वह भी देश की आबादी के लिहाज से कोई असामान्य बात नहीं है।

अगर इसमें कोई विचार करने वाली बात है तो वह यह है कि नागरिकता छोड़ने वाले भारतीयों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी। ऊपरी तौर पर देखें और वर्तमान भारत सरकार के प्रचार तंत्र की सुनें तो देश की स्थिति लगातार अच्छी हो रही है। भारत अब विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीसरी हैसियत के लिए जोर-आजमाइश चल रही है। भारत के नगर-महानगर तो तरक्की कर ही रहे हैं गांवों की तस्वीर भी तेजी से बदल रही है। छोटे शहरों में भी मॉल और 'बिग बाजार' खुल रहे हैं। एक्सप्रेसवे का नेटवर्क विस्तार पा रहा है। बाजारों का दायरा बढ़ रहा है। लेकिन यह सब होने के बाद भी संपन्न आबादी देश छोड़ रही है। भारत से विदेश जाकर पढ़ने वाले भी न लौटने का इरादा रखते हैं। नई पीढ़ी संपन्न देशों में जाकर अपने सपने साकार करना चाहती है और उन साकार होते सपनों में अपने परिवार को शामिल करके 'दूसरी धरती' पर ही बस जाना चाहती है। उसे भारत अच्छा तो लगता है, पर दूर से। विरासत, संस्कार, परंपराएं सब ठीक हैं लेकिन निजी समृद्धि के अवसर पश्चिम के उन्नत देशों में भरोसे के साथ उपलब्ध हैं। बीते 10 साल में बहुत कुछ बदल जाने का दावा भी भारतीयों की विदेश जाने की चाहत को कम नहीं कर पाया है।

एक शब्द है गारंटी। यह भारतीयों को विदेश में अधिक दिखती है, शायद अपने देश में नहीं या न के बराबर। सामान्य समाज के साथ कारोबारी वर्ग इस शब्द के मायने भारत और विदेश के संदर्भ में अधिक और जल्दी समझ सकता है। बड़ी आबादी के कारण भारत में अवसर तो कम हैं ही, लेकिन भरोसा उससे भी कम है। यह भरोसा कि अगर मेहनत करेंगे तो हक मिलेगा ही। फिर व्यवस्था ने भी आम आदमी के लिए बहुत कुछ सुनिश्चित नहीं किया है। श्रम का सम्मान ढकोसलों में बदल चुका है। उसकी कीमत मिलना तो दूर की बात है। कार्यस्थलों पर चालाकी और चाटुकारिता का बोलबाला है। सामाजिक-आर्थिक दरारें लगातार बढ़ रही हैं। सुकून का जीवन दूभर हो रहा है। ऐसे में जो समर्थ है वह तो 'सीमा' पार करेगा ही।

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