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आहार, व्यवहार और विचार

दरअसल, समस्या उतनी आहार की नहीं है जितनी शारीरिक क्रियाओं, जीवन शैली और सामंजस्य की है।

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पश्चिमी जगत बनाम भारतीय आहार पर बहस या इसकी बात कोई नई नहीं है। जीवन-शैली और स्वास्थ्य को लेकर जब भी चर्चा हुई है तो दोनों संसारों के खानपान का जिक्र भी हुआ और फिर विभिन्न पैमानों पर तुलनाएं की गईं। सेहत और विचार की दृष्टि से भले भारतीय पारंपरिक आहार को बेहतर बताया गया हो लेकिन खानपान कहीं का भी हो उसे मानवीय शरीर के लिहाज से व्यवहार की कसौटी पर परखना जरूरी है।

इसी क्रम में हाल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर से पोषण प्रशिक्षक बनीं नेहा शाह ने एक पॉडकास्ट चर्चा में चेताया कि पश्चिमी आहार प्रवासी भारतीयों को नुकसान पहुंचा रहा है। इसी चर्चा में शाह ने खान-पान संबंधी विकल्पों में परंपराओं और जड़ों की ओर लौटने की सलाह दी।

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शाह की सलाह अपनी जगह सही हो सकती है लेकिन सवाल यह है कि यह कितना व्यावहारिक है। क्या अमेरिका में भारतीय पारंपरिक आहार दिनचर्या के लिहाज से लगातार संभव है। जहां तक पारंपरिक आहार की बात है तो उसमें सतत रूप से प्रयोग के नाम पर बदलाव होते रहे हैं। भारत में ही हो रहे हैं। भारत के बड़े शहर और महानगर खनपान में प्रयोग के नाम पर परंपराओं को छोड़ रहे हैं। अमेरिका में जो भारतीय पारंपरिक खानपान लोकप्रियता पा रहा है वह भी प्रयोगों से अछूता नहीं है।


शाह की बात पश्चिमी आहार से प्रवासियों को होने वाले नुकसान से शुरू हुई थी। लेकिन पश्चिमी आहार से प्रवासियों को होने वाले जिस नुकसान या व्याधियों की वे बात कह रही हैं वे सारी बीमारियां तो भारत में भी लोगों को घेरे हुए हैं। उनका इशारा व्यापक हृदय-चयापचयी संबंधी समस्याओं की ओर है। जैसे मधुमेह, थायरॉइड, हाई कॉलेस्ट्रॉल, खाद्य असहिष्णुता, कम ऊर्जा और व्यायाम के बावजूद कम प्रतिरोधक क्षमता। इन विकारों से अमेरिका ही नहीं भारत और दुनिया के लोग जूझ रहे हैं। मधुमेह, हाई कॉलेस्ट्रॉल और लगातार कम होती शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पूरी दुनिया का दुखड़ा है। 

दरअसल, समस्या उतनी आहार की नहीं है जितनी शारीरिक क्रियाओं, जीवन शैली और सामंजस्य की है। स्वास्थ्य की गाड़ी आहार और शारीरिक श्रम के संतुलन से चलती है। दुर्भाग्य से आज की जीवन शैली में वह संतुलन टूट चुका है। अधिकांश समस्याएं इसी असंतुलन से पैदा हुई हैं। लगातार काम करना, कम सोना, सही समय पर भोजन न करना, हानिकारक व्यस्नों से दूरी न बना पाना और तमाम टूटे हुए क्रमों की असमय प्रतिपूर्ति करने की कोशिशों से शरीर का तंत्र सुचारू काम नहीं कर सकता।

आहार में स्वच्छता और शुद्धता जरूरी है किंतु भौगोलिक, स्थितिजन्य और उपलब्धता संबंधी व्यावहारिकताएं देखना भी जरूरी है। जो उपलब्ध है विकल्प तो उसमें से ही चुनना होगा। हां, जो है उसके साथ सामंजस्य बैठाना हमारे हाथ में है। जरूरी यह भी है कि संतुलित दिनचर्या का पालन किया जाए।

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