बीते एक दशक का अगर आखिरी कुछ अर्सा छोड़ दिया जाए तो अमेरिका-भारत लगातार एक-दूसरे के निकट आए हैं। लोगों का लोगों से मेलजोल ही नहीं बढ़ा, अमेरिका के व्यापारिक- सामाजिक-राजनीतिक संसार में भारतीयों की लगातार बढ़ती भागीदारी, अमेरिका स्थिति दुनिया की अनेक बड़ी कंपनियों के शीर्ष पदों तक भारतीयों की पहुंच और एक आम संवाद में भारतीयों की छवि और क्षमता की सकारात्मक तस्वीर ने दोनों देशों को और पास लाने का महती काम किया है। अलबत्ता, अमेरिका में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत, टैरिफ के रूप में, भारत के लिए एक तल्ख अहसास साबित हुई है। और वहीं से उठी टीस दोनों देशों के संबंधों के बीच अब भी बाकी है। भले ही सियासी या निजी कारणों से ही सही लेकिन अमेरिका की पाकिस्तान से बढ़ती नजदीकियों ने भारतीयों के दिलों में एक मलाल पैदा किया है। बावजूद इसके इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दोनों ही देशों में उन लोगों की संख्या अधिक है संयुक्त कदमताल के हिमायती हैं।
अमेरिकी राजनीतिज्ञ और विचारक जब-तब दोनों देशों के संबंधों को महत्वपूर्ण से अधिक परस्पर जरूरी बताते रहे हैं। भारत के सियासी और सामरिक जानकार भी द्वपक्षीय रिश्तों में अधिक मजबूती के हामी रहे हैं। हाल ही में स्टैनफोर्ड में आयोजित संवाद भी भारत-अमेरिका साझेदारी को एक-दूसरे के लिए अहम बताता है। भारतीय राजनीतिज्ञों से लेकर वित्त, नीति और राजनय के जानकार दोनों देशों के रिश्तों में मजबूती चाहते हैं और भविष्य में साझा हितों को लेकर आशावादी हैं। बात चाहे पिछले राष्ट्रपति जो बाइडन की हो अथवा वर्तमान में ट्रंप की, दोनों ही सत्ता-पुरुष इस बात को लेकर एकमत दिखते हैं कि भारत-अमेरिका साझेदारी 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारियों में से एक है। दोनों के बयान इस बात के साक्षी भी हैं। दोनों ही ओर से साझा व्यापार बढ़ाने को लेकर लगातार काम हो रहा है और दोनों मुल्कों ने 2030 तक के लिए बड़ा लक्ष्य भी रखा है।
यह सही है कि फिलहाल गति में कुछ ठहराव है, संबंधों में हल्की सी शिथिलता है लेकिन दोनों देशों की संयुक्त कदमताल के हिमायती दोनों ही ओर अधिक हैं। इनकी तुलना में आलोचकों की संख्या काफी कम है। दूसरे कार्यकाल में ट्रंप की सख्ती ने 'अमेरिकी सपने' पर चोट तो की है लेकिन भारतीय लोगों की आंखों में वह अब भी बसा हुआ है और दिलों में धड़कता तो है। इस सपने के बचे रहने की एक बड़ी वजह यह भी है कि हर कार्यकाल की एक हद मुकर्रर है। नीतियां अगर एक बार बदलती हैं तो फिर बदली जा सकती हैं। और बदलती हैं। हरेक सत्ता की अपनी कार्यप्रणाली होती है। ट्रंप की कार्यप्रणाली 'औचक' और शायद कुछ हद तक 'अनिश्चित' है। ऐसे में कहीं कुछ चीजें ठहर गई हैं, लेकिन खत्म नहीं हुई हैं। जैसे अमेरिकी सपना। यह सपना भी आवाज बनकर साथ चलने की गुहार लगा रहा है।
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