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UAE के साथ रक्षा साझेदारी, खाड़ी में भारत की नई भूमिका

यह साझेदारी अब काइनेटिक और नॉन-काइनेटिक दोनों क्षेत्रों तक फैली है—जिसमें खुफिया समन्वय, वित्तीय निगरानी, साइबर सुरक्षा और नियामक सहयोग शामिल है।

भारत और यूएई रक्षा साझेदारी / X/@narendramodi

भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच रक्षा संबंध अब महज़ लेन-देन आधारित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे गहरे रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग के एक स्पष्ट ढांचे की ओर बढ़ रहे हैं। यह निष्कर्ष एक रिपोर्ट में सामने आया है, जिसमें दोनों देशों के बीच जनवरी 2026 में हुए Strategic Defence Partnership Agreement को इस बदलाव का अहम संकेत बताया गया है।

अमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (AIDSS) की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनु शर्मा ने India Narrative में लिखे अपने विश्लेषण में कहा कि यह रक्षा समझौता रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, तकनीक और निवेश से जुड़े व्यापक करारों का हिस्सा है और भारत-UAE के Comprehensive Strategic Partnership को संस्थागत रूप से और मजबूत करता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित रणनीतिक रक्षा साझेदारी ढांचा रक्षा औद्योगिक सहयोग, नवाचार और उन्नत तकनीक, प्रशिक्षण व शिक्षा, सैन्य सिद्धांतों का विकास, विशेष अभियान, इंटरऑपरेबिलिटी, साइबरस्पेस और आतंकवाद-रोधी सहयोग जैसे कई क्षेत्रों को समाहित करता है। यह सहयोग अब सीमित सैन्य संपर्कों से आगे बढ़कर संरचित और दीर्घकालिक साझेदारी का रूप ले रहा है।

विश्लेषण में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक हालात और बढ़ते तनावों के बीच इस समझौते का समय बेहद अहम है। UAE के लिए पिछले एक दशक ने यह स्पष्ट किया है कि सैन्य क्षमता, खुफिया साझेदारी और उन्नत तकनीक तक पहुंच के लिए साझेदारों का विविधीकरण जरूरी है।

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वहीं भारत के लिए पश्चिम एशिया की अस्थिरता का सीधा असर ऊर्जा कीमतों, भारतीय प्रवासी समुदाय की सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा पर पड़ता है—ऐसी चुनौतियां जिन्हें केवल कूटनीति के जरिए हल नहीं किया जा सकता।

रिपोर्ट में बताया गया कि आतंकवाद-रोधी सहयोग और वित्तीय निगरानी इस साझेदारी के अहम स्तंभ बनकर उभरे हैं। दोनों देशों ने सीमा-पार आतंकवाद सहित हर प्रकार के आतंकवाद की निंदा दोहराई है और FATF ढांचे के तहत आतंक वित्तपोषण रोकने व मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी तंत्र को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई है।

यह साझेदारी अब काइनेटिक और नॉन-काइनेटिक दोनों क्षेत्रों तक फैली है—जिसमें खुफिया समन्वय, वित्तीय निगरानी, साइबर सुरक्षा और नियामक सहयोग शामिल है।

रिपोर्ट में India–Middle East–Europe Economic Corridor (IMEC) का भी उल्लेख किया गया है, जहां भारत और UAE को केंद्रीय भागीदार माना गया है। इजरायल के साथ दोनों देशों के मजबूत संबंध इस समन्वय को व्यापक क्षेत्रीय रणनीतिक महत्व देते हैं।

डॉ. अनु शर्मा के अनुसार, जैसे-जैसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र में आ रहे हैं, वैसे-वैसे रक्षा साझेदारियां जियो-इकोनॉमिक रणनीति की ‘इंश्योरेंस लेयर’ बनती जा रही हैं।

भारत के दृष्टिकोण से यह समझौता खाड़ी क्षेत्र में केवल आर्थिक हितधारक से आगे बढ़कर क्षेत्रीय सुरक्षा में अधिक सक्रिय भूमिका का संकेत देता है, खासकर समुद्री सुरक्षा, साइबर खतरे, ड्रोन युद्ध और आतंकी फंडिंग नेटवर्क जैसे गैर-पारंपरिक खतरों के संदर्भ में।

UAE के लिए भारत के साथ रक्षा सहयोग का मतलब है सुरक्षा और औद्योगिक साझेदारियों का विविधीकरण। भारत का तेजी से बढ़ता डिफेंस-इंडस्ट्रियल बेस UAE को सह-विकास और मजबूत सप्लाई-चेन साझेदारी का अवसर देता है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह कोई पारंपरिक सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संरेखण है—जो बहुध्रुवीय और संकट-संवेदनशील क्षेत्रीय माहौल में भारत-UAE संबंधों को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।

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