भारत और जीसीसी में एफटीए पर बातचीत / IANS/X/@PiyushGoyal
भारत और गल्फ को-ऑपरेटिव काउंसिल (जीसीसी) के बीच करीब पंद्रह वर्षों बाद मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर औपचारिक रूप से वार्ता फिर शुरू करने का फैसला दोनों पक्षों के रिश्तों में एक अहम भू-आर्थिक मोड़ माना जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अब यह संबंध केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भू-आर्थिक पुनर्संतुलन पर अधिक केंद्रित हो गया है।
वार्ता की बहाली केवल व्यापारिक घटना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत भी है। यह दर्शाता है कि पश्चिम एशिया के देश खंडित वैश्विक व्यवस्था के बीच अपने भू-आर्थिक साझेदारी दायरे का विस्तार कर रहे हैं। क्षेत्र में अब व्यापार कूटनीति को रणनीतिक स्थिरता के उपकरण के रूप में देखा जा रहा है।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि खाड़ी देश संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। विशाल परियोजनाएं, संप्रभु संपत्ति कोष के निवेश और गैर-तेल औद्योगिक विस्तार उनकी आर्थिक संरचना को नया रूप दे रहे हैं। विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, हाइड्रोजन ऊर्जा, वित्तीय प्रौद्योगिकी और उन्नत अवसंरचना खाड़ी विकास रणनीति के प्रमुख स्तंभ बन चुके हैं। इन बदलावों के लिए उच्च विकास दर वाले एशियाई बाजारों से गहरा जुड़ाव जरूरी है और विशाल श्रमबल व तकनीकी क्षमता के कारण भारत इस प्रक्रिया में अहम साझेदार बनता है।
दूसरी ओर, नई दिल्ली भी अपनी आर्थिक रणनीति को नए सिरे से परिभाषित कर रही है। भारत बाजार पहुंच सुरक्षित करने और मजबूत आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत होने के लिए सक्रिय रूप से व्यापार समझौतों को आगे बढ़ा रहा है। व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) और अन्य मुक्त व्यापार समझौतों के जरिए भारत ने दिखाया है कि रणनीतिक लाभ होने पर वह शुल्क युक्तिकरण और नियामकीय समन्वय के लिए तैयार है।
भारत-जीसीसी के बीच पहले की वार्ता वर्ष 2008 में शुल्क, पेट्रोकेमिकल पहुंच, सेवा क्षेत्र की गतिशीलता और मानकों पर मतभेद के कारण ठप हो गई थी। हालांकि तब से भू-राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में व्यापक बदलाव आया है, जिसने वार्ता दोबारा शुरू होने का रास्ता साफ किया है।
भारत के लिए यह एफटीए दवा उद्योग, कृषि उत्पाद, वस्त्र, मशीनरी और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के निर्यात को प्रतिस्पर्धी बढ़त दे सकता है। शुल्क में कमी और मानकों के सामंजस्य से उस क्षेत्र में बाधाएं घटेंगी जहां पहले नियामकीय विविधता विस्तार में रुकावट बनती थी। वहीं जीसीसी देशों के लिए भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार और औद्योगिक आधार तक पहुंच आर्थिक विविधीकरण का अवसर प्रदान करेगी। खाड़ी देशों के संप्रभु संपत्ति कोष पहले ही भारत के बुनियादी ढांचे, अक्षय ऊर्जा और स्टार्ट-अप क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश कर चुके हैं। एफटीए का ढांचा इन निवेश प्रवाहों को संस्थागत और संरक्षित करेगा।
यह समझौता भारत की संपर्क-परियोजनाओं की महत्वाकांक्षाओं से भी जुड़ा है। प्रस्तावित इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर (आईएमईसी) दक्षिण एशिया को पश्चिम एशिया के जरिए यूरोप से जोड़ने की साझा रुचि को दर्शाता है। ऐसे परिदृश्य में एफटीए परिवहन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के लिए आवश्यक कानूनी और नियामकीय ढांचा प्रदान कर सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत-जीसीसी एफटीए की दिशा में यह कदम दोनों पक्षों के बीच ऊर्जा आधारित रिश्ते से आगे बढ़कर व्यापक भू-आर्थिक साझेदारी की ओर निर्णायक परिवर्तन का संकेत है।
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