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वर्ष 2025 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट- एफडीआई) में 73 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई। पिछले साल भारत में कुल 47 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया। यह बढ़ोतरी सेवा और उत्पादन क्षेत्र में बड़े निवेश की वजह से हुई है।
संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि विदेशी निवेश में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र में बड़े निवेश की वजह से हुई है। इसमें वित्तीय सेवाएं, आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) और अनुसंधान एवं विकास जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसके अलावा उत्पादन क्षेत्र में भी निवेश बढ़ा है, जिसे भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखला से जोड़ने वाली सरकारी नीतियों से समर्थन मिला। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की विदेशी निवेश वृद्धि दर दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाले देशों में शामिल रही।
ग्लोबल इन्वेस्टमेंट ट्रेंड्स मॉनिटर के नवीनतम अंक के अनुसार, पिछले साल के पहले तीन तिमाहियों में भारत में डाटा सेंटर्स में कुल 7 अरब डॉलर का निवेश हुआ। इस दौरान डाटा सेंटर्स में निवेश पाने वाले देशों की सूची में भारत सातवें स्थान पर रहा। हालांकि, चौथी तिमाही में डाटा सेंटर क्षेत्र में विदेशी निवेश में अचानक तेज उछाल आया, जिससे यह क्षेत्र और अधिक सक्रिय हो गया।
अक्टूबर में गूगल ने घोषणा की थी कि वह आंध्र प्रदेश में एआई हब के लिए 15 अरब डॉलर का निवेश करेगी। तो वहीं दिसंबर में माइक्रोसॉफ्ट कंपनी ने एआई और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और डाटा सेंटर्स में 17.5 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की। इसी तरह दिसंबर में ही अमेजन ने कहा कि वह एआई और अन्य क्षेत्रों में 35 अरब डॉलर का निवेश करेगी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, ये सभी निवेश अगले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे किए जाएंगे।
वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो पिछले साल दुनिया भर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और कुल निवेश बढ़कर 1.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया रिपोर्ट में कहा गया कि वर्ष 2025 में औद्योगिक रुझान यह दिखाते हैं कि अब डाटा सेंटर वैश्विक निवेश को दिशा दे रहे हैं। कुल नए निवेश परियोजनाओं के मूल्य का लगभग पांचवां हिस्सा डाटा सेंटर्स से जुड़ा रहा।
एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल नेटवर्क की बढ़ती मांग के कारण इस क्षेत्र में घोषित निवेश 270 अरब डॉलर से अधिक रहा। इसके साथ ही सेमीकंडक्टर उद्योग भी तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र रहा, जहां हाल ही में घोषित प्रोजेक्ट्स के मूल्य में 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
वहीं जिन क्षेत्रों पर शुल्क जोखिम का असर पड़ा, वहां परियोजनाओं की संख्या में 25 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई, जिसमें वस्त्र उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित रहे। यूएनसीटीएडी के अनुसार, दुनिया में सबसे अधिक विदेशी निवेश विकसित देशों में गया, जहां कुल निवेश 43 प्रतिशत बढ़कर 728 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत एक अपवाद रहा, जबकि विकासशील देशों में विदेशी निवेश 2 प्रतिशत घटकर 877 अरब डॉलर रह गया।
संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि लगातार तीसरे साल चीन में विदेशी निवेश में गिरावट दर्ज की गई। चीन में निवेश 8 प्रतिशत घटकर 107.5 अरब डॉलर रह गया, हालांकि निवेश का बड़ा हिस्सा रणनीतिक और तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में केंद्रित रहा। यूएनसीटीएडी ने कहा कि कुल मिलाकर, वैश्विक स्तर पर निवेशकों का भरोसा अभी कमजोर बना हुआ है।
रिपोर्ट में कहा गया, "ऊपरी आंकड़ों में दिखाई दे रही वृद्धि पूरी सच्चाई नहीं बताती। नीति निर्माताओं को केवल धन के प्रवाह पर नहीं, बल्कि वास्तविक निवेश को बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।" निवेशकों के कमजोर भरोसे का संकेत देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि अंतरराष्ट्रीय विलय और अधिग्रहण के मूल्य में 10 प्रतिशत की गिरावट आई।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय परियोजना वित्त पोषण लगातार चौथे साल घटा है। इसकी कुल राशि में 16 प्रतिशत और सौदों की संख्या में 12 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जो 2019 के स्तर के करीब है। रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीनफील्ड परियोजनाओं की घोषणाओं की संख्या में 16 प्रतिशत की गिरावट आई है, हालांकि कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स की वजह से कुल परियोजना मूल्य ऊंचा बना रहा।
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