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भारत-चीन साथ आएं तो खत्म हो सकता है ये बड़ा खतरा? राहुल गुप्ता ने कही ये बड़ी बात

एक विशेष साक्षात्कार में गुप्ता ने कहा कि सिंथेटिक ड्रग्स के वैश्विक खतरे से कोई भी देश अछूता नहीं है। दुनिया में हर तीसरा व्यक्ति या तो भारतीय है या चीनी। इसलिए इन दोनों देशों के लिए इस समस्या पर साथ मिलकर काम करना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह भविष्य में मानवता की सबसे बड़ी समस्या बन सकती है।

 भारत और चीन को ड्रग्स के खतरे के खिलाफ मिलकर काम करना चाहिए: राहुल गुप्ता भारत और चीन को ड्रग्स के खतरे के खिलाफ मिलकर काम करना चाहिए: राहुल गुप्ता / IANS

पूर्व व्हाइट हाउस ड्रग नीति प्रमुख राहुल गुप्ता ने कहा है कि भारत और चीन को सिंथेटिक ड्रग्स और फेंटेनाइल तस्करी के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यह समस्या भविष्य में मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकती है।

एक विशेष साक्षात्कार में गुप्ता ने कहा कि सिंथेटिक ड्रग्स के वैश्विक खतरे से कोई भी देश अछूता नहीं है। दुनिया में हर तीसरा व्यक्ति या तो भारतीय है या चीनी। इसलिए इन दोनों देशों के लिए इस समस्या पर साथ मिलकर काम करना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह भविष्य में मानवता की सबसे बड़ी समस्या बन सकती है।

बाइडेन प्रशासन के दौरान व्हाइट हाउस के ऑफिस ऑफ नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी के निदेशक रहे गुप्ता ने कहा कि फेंटेनाइल संकट अब एक वैश्विक चुनौती बन चुका है और इससे निपटने के लिए सरकारों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के बीच समन्वित प्रयास जरूरी हैं।

उन्होंने कहा कि अमेरिका में ओवरडोज से होने वाली मौतों में हालिया कमी के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला चीन से मैक्सिको भेजे जाने वाले फेंटेनाइल के रासायनिक घटकों की आपूर्ति में कमी और दूसरा उपचार तथा ओवरडोज रोकथाम कार्यक्रमों का बड़े पैमाने पर विस्तार।

गुप्ता ने कहा कि हमारे पास प्रमाण हैं कि चीन से मैक्सिको भेजे जाने वाले वे रसायन जिनसे फेंटेनाइल बनाया जाता है और बाद में अमेरिका में तस्करी कर लाया जाता है।

उन्होंने बताया कि नालोक्सोन दवा की व्यापक उपलब्धता, उपचार सेवाओं के विस्तार और टेलीहेल्थ कार्यक्रमों ने भी हजारों लोगों की जान बचाने में मदद की है। उन्होंने कहा कि इन सभी प्रयासों ने मिलकर पिछले दो से तीन वर्षों में अमेरिका में हजारों लोगों की जान बचाई है।

गुप्ता ने इस मुद्दे पर वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच जारी संवाद का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया बैठक से स्पष्ट है कि फेंटेनाइल का मुद्दा अमेरिका की प्राथमिकताओं में बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि यह दिखाता है कि अमेरिका फेंटेनाइल के मुद्दे पर लगातार ध्यान देता रहेगा। चीन पर दबाव बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि दोनों देशों के संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण परिणाम हैं और इन परिणामों का माप अमेरिकी लोगों की जिंदगी से होगा।

हालांकि गुप्ता ने चेतावनी दी कि हाल में जो सकारात्मक परिणाम मिले हैं, उनकी रफ्तार अब धीमी पड़ती दिख रही है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि मौतों में गिरावट अब स्थिर होने लगी है। इसका मतलब है कि पहले जैसी तेज कमी अब नहीं दिख रही। इसलिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम अपने प्रयासों को दोगुना और तिगुना करें ताकि जितनी अधिक अमेरिकी जानें बचाई जा सकें, बचाई जाएं।

भारत के बारे में पूछे जाने पर गुप्ता ने कहा कि भारत ने इस खतरे की गंभीरता को समझा है और इससे निपटने की इच्छा भी दिखाई है। उन्होंने कहा कि भारत आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार रहा है। भारत का विशाल रासायनिक उद्योग अवैध मादक पदार्थों की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े अपराधियों के निशाने पर आ सकता है, इसलिए सतर्कता जरूरी है।

पंजाब का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने कहा कि वहां रोकथाम, उपचार और कानून प्रवर्तन के प्रयासों को और मजबूत किया जाना चाहिए। मैं हाल ही में पंजाब गया था। वहां मेरी मुलाकात स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य विभाग के निदेशक से हुई। वे इस समस्या से निपटने के लिए काफी सक्रिय दिखाई दिए और चाहते हैं कि इन प्रयासों का और विस्तार हो ताकि ज्यादा लोगों की जान बचाई जा सके।

गुप्ता ने कहा कि इस संकट से निपटने में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोग बेहद महत्वपूर्ण होगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नशीले पदार्थों के खतरे को लेकर चिंता जता चुके हैं।

उन्होंने कहा कि तस्करों के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ उपचार सुविधाओं का विस्तार भी जारी रहना चाहिए।

फेंटेनाइल संकट हाल के वर्षों में अमेरिका के सामने सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बनकर उभरा है। सिंथेटिक ओपिओइड्स बड़ी संख्या में ओवरडोज मौतों के लिए जिम्मेदार रहे हैं, जिसके चलते लगातार अमेरिकी प्रशासन कानून प्रवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए इस समस्या से निपटने की कोशिश कर रहे हैं।

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