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खुद को नए सिरे से गढ़ने का उपहार

जब मैं 45 वर्ष से भी अधिक समय पहले अमेरिका आया था, तब मैं भारत का एक युवा भौतिक विज्ञानी था, जिसने हाल ही में अपनी पीएचडी पूरी की थी।

 सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर / AI Generated

जब मैं 45 वर्ष से भी अधिक समय पहले अमेरिका आया था, तब मैं भारत का एक युवा भौतिक विज्ञानी था, जिसने हाल ही में अपनी पीएचडी पूरी की थी। मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ यूटा में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च एसोसिएट के रूप में काम शुरू किया। मैं ऐसे माहौल में बेहतरीन वैज्ञानिकों के साथ काम करने का अवसर पाकर उत्साहित था, जहां सवाल पूछने और नई चीजों की खोज को महत्व दिया जाता था।
कई अन्य प्रवासियों की तरह मैं भी एक सार्थक करियर बनाने और बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर अमेरिका आया था। अमेरिका ने मुझे वे अवसर दिए। लेकिन आज, चार दशकों से अधिक की अपनी यात्रा को पीछे मुड़कर देखते हुए मुझे एहसास होता है कि इस देश ने मुझे उससे भी अधिक महत्वपूर्ण कुछ दिया।
अमेरिका ने मेरी कल्पना का दायरा बढ़ाया। इसने मुझे सिखाया कि किसी व्यक्ति का भविष्य उसके अतीत तक सीमित होना जरूरी नहीं है। और इंसान अपने जीवन में एक से अधिक बार खुद को नए सिरे से गढ़ सकता है। भारत में बड़े होते हुए मैंने शिक्षा, अनुशासन और दृढ़ता का महत्व सीखा था। यही मूल्य मेरे जीवन की नींव बने।
लेकिन मेरे भीतर इस बात को लेकर कुछ अनकही धारणाएं भी थीं कि किसी व्यक्ति का करियर कैसा होना चाहिए। कोई व्यक्ति वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर या प्रोफेसर बनता है और फिर अपना पूरा जीवन उसी क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता बढ़ाने में लगा देता है। एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाना इस जोखिम से जुड़ा था कि लोग आपको लक्ष्यहीन या अस्थिर समझ सकते हैं।
और जीवन में दोबारा शुरुआत करने का अर्थ अपनी असफलता स्वीकार करना माना जाता था। अमेरिका ने मुझे एक अलग संभावना से परिचित कराया। यहां मैं ऐसे लोगों से मिला, जो आसानी से अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते थे...स्वीकार किए जा चुके विचारों पर सवाल उठाते थे...और दोबारा शुरुआत करने से नहीं डरते थे।
यहां खुद को नए सिरे से गढ़ने को दिशाहीनता नहीं, बल्कि जिज्ञासा और विकास की अभिव्यक्ति माना जाता था। धीरे-धीरे मेरी अपनी सोच भी बदलने लगी। मैंने यह विश्वास करना शुरू किया कि जीवन को किसी पहले से लिखी हुई पटकथा के अनुसार चलना जरूरी नहीं है। और इस अनुभव में मैं अकेला नहीं हूं।

कई भारतीय-अमेरिकियों ने पाया है कि दो संस्कृतियों के बीच रहने का अनुभव उन्हें केवल अपना करियर ही नहीं, बल्कि घर, पहचान और ज्ञान को लेकर अपनी समझ भी नए सिरे से गढ़ने का अवसर देता है। इस बदलाव ने सब कुछ बदल दिया। भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में कई वर्ष बिताने के बाद मुझे एप्पल में काम करने का अवसर मिला।
उस समय एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाना असामान्य फैसला लगता था। लेकिन उस अनुभव ने रचनात्मकता, नवाचार और मानवीय क्षमता को लेकर मेरी सोच को पूरी तरह बदल दिया। एप्पल केवल एक प्रौद्योगिकी कंपनी नहीं थी। वह एक ऐसी कार्य संस्कृति थी, जहां स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाना अपेक्षित था।
वहां लोगों को सीमाओं की चिंता करने से पहले संभावनाओं की कल्पना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। एप्पल में काम करने के दौरान मेरी दिलचस्पी केवल कंप्यूटरों तक सीमित नहीं रही।
मैं एक बड़े सवाल को लेकर उत्सुक होने लगा - मनुष्य सीखता कैसे है, आगे कैसे बढ़ता है और बड़ी उपलब्धियां कैसे हासिल करता है? प्रौद्योगिकी लगातार अधिक शक्तिशाली होती जा रही थी। लेकिन मैं खुद से एक अलग सवाल पूछने लगा - क्या प्रौद्योगिकी हमें अधिक बुद्धिमान तो बना सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि अधिक विवेकशील भी बनाए?
अंततः यही सवाल मुझे प्रौद्योगिकी की दुनिया से आगे ले गया।
मैंने एग्जीक्यूटिव कोचिंग, नेतृत्व विकास, अध्यापन और आधुनिक संगठनों के संदर्भ में भारतीय दर्शन के अध्ययन की दिशा में काम करना शुरू किया। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो मेरे जीवन के ये बदलाव लगभग असंभव से लगते हैं। एक भौतिक विज्ञानी का एग्जीक्यूटिव कोच बनना फिर नेतृत्व का प्रोफेसर बनना और बाद में वेदांत, भगवद्गीता और मानव विकास के गहन अध्ययन में शामिल होना।
लेकिन वास्तव में हर कदम पिछले कदम से स्वाभाविक रूप से निकला। क्योंकि मैंने खुद को केवल एक पहचान तक सीमित करना छोड़ दिया था। मेरे जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि भारत छोड़ने के बाद ही मैंने भारत को अधिक गहराई से जाना। अमेरिका में रहने का अर्थ था अलग-अलग संस्कृतियों, धर्मों और दार्शनिक परंपराओं के लोगों के बीच रहना।
जीवन के अर्थ...नैतिकता...आस्था...और जीवन के उद्देश्य... पर होने वाली बातचीत ने मुझे यह एहसास कराया कि जिस परंपरा में मेरा जन्म हुआ था, उसके बारे में मेरी समझ कितनी सीमित थी।
खुद को हिंदू कहने का वास्तविक अर्थ क्या है? वेदांत धर्म से किस तरह अलग है? उपनिषद और भगवद्गीता वास्तव में चेतना और आत्म के बारे में क्या कहते हैं? धीरे-धीरे इन सवालों ने मुझे फिर से संस्कृत, वेदांत और भारत की बौद्धिक परंपराओं की ओर लौटाया। यह मेरे जीवनभर के अध्ययन और चिंतन की यात्रा बन गई।
विडंबना यह है कि यदि मैं भारत में ही रहता, तो शायद यह यात्रा इतनी गहराई से कभी शुरू नहीं होती। दूरी कई बार चीजों को अधिक स्पष्ट रूप से देखने का अवसर देती है। एक दूसरी संस्कृति में रहने से मुझे अपनी संस्कृति को एक नई नजर से देखने का मौका मिला।
समय के साथ मुझे एक और महत्वपूर्ण बात समझ में आई। पश्चिमी बौद्धिक परंपरा ने मुझे कठोर वैज्ञानिक खोज, विश्लेषणात्मक सोच, संस्थागत उत्कृष्टता और नवाचार की संस्कृति दी। वहीं भारतीय परंपरा ने चेतना, आत्म-जागरूकता और विवेक के बारे में उतनी ही गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान की।
मैंने इन दोनों परंपराओं को एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी मानने के बजाय एक-दूसरे की पूरक के रूप में देखना शुरू किया। दोनों परंपराएं ऐसे सवालों पर प्रकाश डालती हैं, जिन्हें दूसरी परंपरा अक्सर नजरअंदाज कर देती है। इसी समझ ने पिछले तीन दशकों में मेरे अधिकांश काम को दिशा दी है।
चाहे वह सीईओ को मार्गदर्शन देना हो... नेतृत्व पढ़ाना हो... किताबें लिखना हो... या संवाद के लिए नए मंच बनाने में मदद करना हो... मैंने हमेशा इन दोनों परंपराओं के बीच पुल बनाने की कोशिश की है।
मेरा उद्देश्य कभी यह साबित करना नहीं रहा कि किसी एक सभ्यता के पास सभी सवालों के जवाब हैं। मेरा उद्देश्य यह समझना रहा है कि जब अलग-अलग सभ्यताएं एक-दूसरे से सीखती हैं, तो कौन-सी नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। आज अमेरिका अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है।
आव्रजन एक विवादास्पद मुद्दा बन चुका है। राजनीतिक विभाजन गहरा हुआ है। और कई प्रवासी यह सोच रहे हैं कि क्या इस देश की वह खुली सोच बदल रही है, जो कभी इसकी पहचान हुआ करती थी। ये चिंताएं वास्तविक हैं। फिर भी मैं आशावादी हूं। मेरा आशावाद आज की चुनौतियों को नजरअंदाज करने से पैदा नहीं होता।
यह इस देश को चार दशकों से अधिक समय तक बदलते और विकसित होते देखने के अनुभव से पैदा होता है। अमेरिका की ताकत कभी भी सभी लोगों को एक जैसा बनाने में नहीं रही। इसकी ताकत हमेशा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों को आकर्षित करने की अद्भुत क्षमता में रही है - ऐसे लोग जिनके अनुभव अलग हैं...सवाल अलग हैं...और सपने अलग हैं और फिर उन्हें ऐसे तरीकों से योगदान देने का अवसर देना, जिनकी उन्होंने खुद भी कभी कल्पना नहीं की थी।
जब मैं पहली बार अमेरिका आया था, तो मेरी उम्मीद केवल एक अच्छा करियर बनाने की थी।मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि अमेरिका मुझे अपनी विरासत को अधिक गहराई से समझने में भी मदद करेगा... उन सीमाओं को पार करने का आत्मविश्वास देगा, जिन्हें मैं कभी स्थायी मानता था और यह सिखाएगा कि सीखना अपने आप में जीवन जीने का एक तरीका बन सकता है।
आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस करता हूं कि अमेरिका ने मुझे केवल अवसर नहीं दिए। इसने मुझे बड़े सवाल पूछने की स्वतंत्रता दी... दोबारा शुरुआत करने का साहस दिया...और यह विश्वास दिया कि अलग-अलग विषयों, संस्कृतियों और सभ्यताओं के बीच पुल बनाने के लिए समर्पित जीवन न केवल संभव है, बल्कि सार्थक भी है।
आज जब अमेरिका अपने 250वें वर्ष का उत्सव मना रहा है, तो मेरी उम्मीद है कि खुद को नए सिरे से गढ़ने की यह स्वतंत्रता व्यक्तियों के लिए भी और स्वयं राष्ट्र के लिए भी इस देश का सबसे बड़ा उपहार बनी रहे। यदि अमेरिका ने मुझे सबसे बड़ा उपहार खुद को नए सिरे से गढ़ने की स्वतंत्रता के रूप में दिया है, तो शायद हम सभी—विशेष रूप से भारत और अमेरिका के बीच जीवन जीने वाले लोग खुद से यह सवाल पूछ सकते हैं - यह देश अब हमें किन नए सवालों, नई पहचानों और नए पुलों की खोज करने के लिए आमंत्रित कर रहा है?


लेखक प्रसाद कैपा सिलिकॉन वैली स्थित सीईओ कोच, नेतृत्व के विद्वान और इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिक विजडम के सह-संस्थापक हैं।

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