नेहा शाह / X/@hinduparenting
भारतीय मूल की पोषण विशेषज्ञ नेहा शाह ने प्रवासी भारतीयों से पारंपरिक भारतीय खानपान अपनाने की अपील की है।
'डायस्पोरा न्यूट्रिशन' की संस्थापक नेहा शाह ने कहा है कि अमेरिका में अपने दूसरे बच्चे के जन्म के बाद कैलोरी गिनने की आदत ने उनकी मानसिक सेहत पर नकारात्मक असर डाला है। इसी अनुभव ने उन्हें भोजन और पोषण को देखने का अपना नजरिया बदलने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ये बातें 'हिंदू पैरेंटिंग पॉडकास्ट' के 65वें एपिसोड में मेजबान रेखा से बातचीत के दौरान कहीं।
नेहा शाह ने बताया कि भोजन की कैलोरी और मात्रा मापने की प्रक्रिया के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि पारंपरिक डाइट सलाह भारतीय खानपान या अमेरिका में रह रहे भारतीय परिवारों की जीवनशैली के अनुरूप नहीं है। उन्होंने पहले कभी डाइटिंग नहीं की थी लेकिन दूसरे बच्चे के जन्म के बाद कमजोरी और शरीर में दर्द महसूस होने पर उन्होंने इंटरनेट पर वजन कम करने से जुड़ी सलाहें अपनानी शुरू कीं।
उन्होंने कहा कि सबसे पहले आपको कैलोरी गिनने के लिए कहा जाता है। मैंने 'माय फिटनेस पाल' ऐप डाउनलोड किया था। खाना तौलने की मशीन भी थी। लेकिन यह सब मेरी मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा रहा था।
नेहा शाह ने कहा कि भारतीय भोजन को केवल कैलोरी या मैक्रोन्यूट्रिएंट्स के आधार पर समझना सही नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दाल में प्रोटीन भी होता है और कार्बोहाइड्रेट भी। दूध में तो तीनों प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा मौजूद होते हैं।
उन्होंने बताया कि उनके जीवन में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उन्होंने अपनी बड़ी बेटी को हर भोजन की मात्रा मापते और उसे ऐप में दर्ज करते हुए खुद को देखते पाया। उसी समय मुझे एहसास हुआ कि मैं क्या कर रही हूं? क्या मुझे अपने बच्चों को यही सिखाना चाहिए? बच्चे हमारी बातें सुनकर नहीं, बल्कि हमें देखकर सीखते हैं।
नेहा शाह ने कहा कि इस अनुभव ने उन्हें अपने बचपन की याद दिला दी। भारत में उनकी मां ने चार बच्चों की परवरिश बिना कभी कैलोरी गिने की थी। हम जिस जगह से सलाह ले रहे हैं, शायद वही गलत है। हम अपने समाधान उन लोगों से खोज रहे हैं जो हमारी संस्कृति और हमारे इतिहास को नहीं समझते।
इसके बाद उन्होंने पोषण विज्ञान यानी न्यूट्रिशन का गहराई से अध्ययन किया और केवल कैलोरी पर आधारित सोच की बजाय पाचन शक्ति (डाइजेस्टिव फायर) पर ध्यान देना शुरू किया।
उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण आपकी पाचन शक्ति है। आपको हर समय आंकड़ों या खाद्य पदार्थों के लेबल पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। अमेरिका में रहने वाले भारतीय परिवारों को संबोधित करते हुए नेहा शाह ने यह भी कहा कि लोगों को यह जानना चाहिए कि उनके रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ कहां से आ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सिर्फ किसी उत्पाद पर भारतीय नाम लिखा होने से पर्याप्त नहीं है। आपको यह भी जानना चाहिए कि उसे बनाने वाली कंपनी कौन है। उन्होंने सलाह दी कि जहां संभव हो आटा, घी, खाने का तेल और डेयरी उत्पाद बड़े स्टोरों की बजाय स्थानीय किसानों से खरीदने की कोशिश करनी चाहिए।
A2 दूध की बढ़ती लोकप्रियता पर भी नेहा शाह ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अगर A2 दूध ऐसी गायों से आ रहा है जिन्हें अस्वच्छ जगहों पर रखा जाता है, जिन्हें ठूंस-ठूंस कर रखा जाता है और जिन्हें आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएमओ) मक्का और सोया खिलाया जाता है तो केवल A2 लिखा होना किसी काम का नहीं है।
उन्होंने कहा कि ब्रांडिंग से अधिक महत्वपूर्ण खेती का तरीका और गायों का प्राकृतिक वातावरण में घास खाना (ग्रास-फेड होना) है।
नेहा शाह ने भारतीय-अमेरिकी माता-पिता से यह भी अपील की कि वे भोजन को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ें। अगर आप बच्चों से सिर्फ यह कहेंगे कि यह खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, तो वे उसे आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि हर सप्ताहांत पूरा परिवार मिलकर एक पारंपरिक भारतीय भोजन तैयार करे और बच्चों को उस भोजन और उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री का इतिहास तथा सांस्कृतिक महत्व भी बताए।
उन्होंने कहा कि हम हर शनिवार और रविवार को अपने घर में पारंपरिक भोजन बनाते हैं। पूरा परिवार मिलकर एक सांस्कृतिक व्यंजन तैयार करता है और उसके पीछे की कहानी भी साझा करता है।
ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT
Comments
Start the conversation
Become a member of New India Abroad to start commenting.
Sign Up Now
Already have an account? Login