रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 जुलाई, 2024 को रूस के मॉस्को के पास नोवो-ओगार्योवो स्थित राजकीय आवास पर एक बैठक में शामिल हुए। / Reuters/Sputnik/Gavriil Grigorov/Pool
मौजूदा अशांत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के दौर में भारत और रूस दशकों पुराने विश्वास, सद्भावना और मित्रता के अपने मजबूत रिश्तों का उपयोग साझा हितों वाले क्षेत्रों में वैश्विक बदलाव को दिशा देने के लिए कर सकते हैं। यह बात बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में कही गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर 2025 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के बाद और वैश्विक व्यवस्था के अस्थिर दौर में, स्थिरता के दो प्रमुख स्तंभों के रूप में भारत और रूस के पास ‘रूस-भारत प्लस’ ढांचे को व्यवहार में लाने के अलावा बहुत अधिक विकल्प नहीं बचे हैं। शुरुआत में इसे दक्षिण और मध्य एशिया में लागू किया जा सकता है, जिसे आगे चलकर अफ्रीका सहित वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देशों तक विस्तारित किया जा सकता है।
रणनीतिक मामलों के विश्लेषक अतुल अनेजा ने ‘जियो पोलिटिका’ के लिए लिखे लेख में कहा, “नए अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के उभरने के बीच, भारत और रूस जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रणाली के दो मजबूत ध्रुवों को दक्षिण और मध्य एशिया में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए पूर्ण रणनीतिक स्पष्टता, उद्देश्य और आपसी विश्वास के साथ मिलकर काम करना होगा। इसके लिए 2+1 फॉर्मूला या रूस-भारत प्लस ढांचे को अपनाया जा सकता है, जिसमें भारत और रूस के साथ किसी तीसरे देश को विशेष क्षेत्रों में सामरिक स्तर पर जोड़ा जाए।”
रिपोर्ट के अनुसार, भारत और रूस के रणनीतिक हित अफगानिस्तान में काफी हद तक मेल खाते हैं, जो दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और चीन के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार माना जाता है।
इसमें कहा गया है कि अफगानिस्तान के साथ भारत और रूस के विशेष संबंध क्षेत्रीय सहयोग की संभावनाओं को बढ़ाते हैं और जरूरत पड़ने पर किसी शत्रुतापूर्ण गैर-क्षेत्रीय शक्ति के रणनीतिक प्रभाव को सीमित करने में भी मदद कर सकते हैं। खासकर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यह अहम हो गया है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि ट्रंप ने बगराम एयरबेस पर नियंत्रण हासिल करने की धमकी दी थी, जिस पर सभी क्षेत्रीय शक्तियों ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने पिछले वर्ष अफगानिस्तान से बगराम एयरबेस का नियंत्रण अमेरिका को लौटाने की मांग की थी और ऐसा न करने पर ‘बुरे परिणाम’ की चेतावनी दी थी। यह एयरबेस काबुल से करीब 64 किलोमीटर दूर स्थित है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि भारत और रूस के भू-राजनीतिक हित न केवल अफगानिस्तान बल्कि मध्य एशिया के देशों में भी मजबूती से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इससे इस संवेदनशील क्षेत्र में संयुक्त भारत-रूस पहलों को विकसित करने की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
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