चिन्मय ए सिंह। / Chinmay A. Singh via X
एक भारतीय-अमेरिकी स्टार्टअप फाउंडर ने भारत के टैक्स सिस्टम की आलोचना की है क्योंकि इसकी वजह से उनके कर्मचारियों के लिए इक्विटी ओनरशिप (हिस्सेदारी) पाना लगभग नामुमकिन हो गया है।
iWish.ai और SimplifiMed (अब TeleVox Healthcare) के फाउंडर चिन्मय ए. सिंह ने भारत के एम्प्लॉई स्टॉक ऑप्शन (ESOP) टैक्स नियमों की आलोचना करते हुए कहा कि अफसरों द्वारा बनाए गए नियमों की वजह से स्टार्टअप अपनी टैलेंटेड टीम के लिए वेल्थ (संपत्ति) नहीं बना पा रहे हैं।
X पर एक पोस्ट में, सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी अमेरिकी कंपनी के लिए बेंगलुरु के बजाय छोटे कस्बों और शहरों से रिमोट रोल के लिए सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को हायर किया। हालांकि, उन्हें अफसोस है कि वे उन्हें इक्विटी नहीं दे पाए क्योंकि इससे उनके कर्मचारियों को नुकसान होता।
उन्होंने कहा कि जैसे ही कोई भारतीय कर्मचारी अपने ऑप्शन का इस्तेमाल करता है (उन्हें शेयरों में बदलता है), तो बिना कुछ बेचे ही उन्हें 'पेपर गेन' (कागजी मुनाफे) पर सैलरी के तौर पर टैक्स देना पड़ता है (मैंने सुना है कि यह 42% तक हो सकता है)।
उन्होंने आगे कहा कि प्राइवेट कंपनी के मामले में कोई खरीदार नहीं होता, कोई लिक्विडिटी नहीं होती और कोई कैश नहीं मिलता। लेकिन उन पर टैक्स का बिल थोप दिया जाता है- जो कभी-कभी उनकी सैलरी से भी ज्यादा होता है - उस पैसे पर जो उन्होंने असल में कमाया ही नहीं है।
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भारत के मौजूदा टैक्स सिस्टम के तहत, कर्मचारियों को ESOP पर टैक्स तब देना पड़ता है जब वे अपने स्टॉक ऑप्शन का इस्तेमाल करते हैं। इसमें फेयर मार्केट वैल्यू और एक्सरसाइज प्राइस के बीच के अंतर को सैलरी इनकम माना जाता है, भले ही शेयर अभी बेचे न जा सकें।
जब वे शेयर आखिरकार बेचे जाते हैं, तो किसी भी अतिरिक्त मुनाफे पर फिर से कैपिटल गेन्स के तौर पर टैक्स लगता है। लिक्विडिटी से पहले टैक्स की इस समस्या से निपटने के लिए, सरकार ने 2020 में DPIIT-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स के कर्मचारियों के लिए टैक्स-डेफरल (टैक्स टालने) का प्रावधान पेश किया। इससे ESOP टैक्स को बाद की किसी घटना, जैसे शेयर बेचने या कंपनी छोड़ने तक टाला जा सकता है, हालांकि टैक्स की देनदारी खत्म नहीं होती।
सिंह ने कहा कि उनके कर्मचारियों को उन शेयरों के लिए अपनी जेब से लाखों रुपये चुकाने पड़ सकते हैं जिन्हें वे बेच नहीं सकते, या फिर उन्हें अपनी इक्विटी छोड़नी पड़ सकती है।
अमेरिका में अपने अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका में, कर्मचारी शेयर बेचने तक कोई टैक्स नहीं देते हैं, और अगर वे उन्हें लंबे समय तक अपने पास रखते हैं, तो उन्हें शायद ही कोई टैक्स (फेडरल) देना पड़े।
उन्होंने कहा कि मैंने सुना है कि भारत में अब टैक्स 'टालने' (डेफरल) की सुविधा है। लेकिन अगर मेरी जानकारी सही है, तो यह सुविधा लगभग 2% स्टार्टअप्स के लिए ही है। अधिकांश दूसरे स्टार्टअप्स की तरह, मेरा स्टार्टअप भी इसके लिए क्वालिफाई नहीं करेगा।
सुधार की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि इसका समाधान एक लाइन में है: शेयरों पर टैक्स तब लगाया जाए जब वे बेचे जाएं, न कि तब जब वे खरीदे जाएं। हर विकसित देश ऐसा ही करता है। भारत भी कल ऐसा कर सकता है, लेकिन वह ऐसा नहीं करता।
उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि भारत देश के नौकरशाहों (ब्यूरोक्रेट्स) की वजह से अपने कानूनों में बदलाव नहीं कर रहा है। साथ ही, उन्होंने यह भी साफ किया कि वे इसके लिए भारत की केंद्रीय वित्त और कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण को दोषी नहीं मानते।
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