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ढिल्लों का खुलासा: UC सैन डिएगो ने एशियाई आवेदकों के साथ किया भेदभाव

न्याय विभाग ने गैर-कानूनी दाखिला प्रक्रिया का हवाला दिया है, जो संघीय नागरिक अधिकार कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन करती है।

 सहायक अटॉर्नी जनरल हरमीत के. ढिल्लों ने यूसी सैन डिएगो की प्रवेश प्रथाओं पर डीओजे के निष्कर्षों की घोषणा की। सहायक अटॉर्नी जनरल हरमीत के. ढिल्लों ने यूसी सैन डिएगो की प्रवेश प्रथाओं पर डीओजे के निष्कर्षों की घोषणा की। / Courtesy Photo

असिस्टेंट अटॉर्नी जनरल हरमीत के. ढिल्लों ने घोषणा की कि अमेरिकी न्याय विभाग ने पाया है कि यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो स्कूल ऑफ मेडिसिन ने अपने एडमिशन प्रोसेस में नस्ल का इस्तेमाल करके फेडरल सिविल राइट्स कानून का उल्लंघन किया है। आरोप है कि स्कूल ने अन्य नस्लीय समूहों के पक्ष में एशियाई और श्वेत आवेदकों के साथ भेदभाव किया।

यह घोषणा न्याय विभाग के सिविल राइट्स डिवीजन ने की। डिवीजन ने निष्कर्ष निकाला कि मेडिकल स्कूल के एडमिशन के तरीके 'सिविल राइट्स एक्ट ऑफ 1964' के 'टाइटल VI' और 'स्टूडेंट्स फॉर फेयर एडमिशन बनाम हार्वर्ड' मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फ़ैसले का उल्लंघन करते हैं। इस फैसले में उच्च शिक्षा में नस्ल-आधारित एडमिशन पर रोक लगाई गई थी।

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विभाग के बयान में ढिल्लों ने कहा कि MCAT स्कोर या GPA पर निर्भर रहने के बजाय, सैन डिएगो मेड का 'शैडो एप्लीकेशन प्रोसेस' (गुप्त आवेदन प्रक्रिया) गैर-कानूनी रूप से आवेदकों की नस्ल के आधार पर एडमिशन के लिए उनका मूल्यांकन करता था। सैन डिएगो मेड की नस्ल को प्राथमिकता देने की खुली कोशिशें गैर-कानूनी हैं, और हम इन तरीकों को खत्म करेंगे।

न्याय विभाग के अनुसार, मेडिकल स्कूल एक ऐसी प्रक्रिया चलाता था जिसे उसने "शैडो एप्लीकेशन प्रोसेस" कहा है। इसमें पारंपरिक शैक्षणिक पैमानों- जैसे मेडिकल कॉलेज एडमिशन टेस्ट (MCAT) स्कोर और अंडरग्रेजुएट ग्रेड पॉइंट एवरेज (GPA)- पर मुख्य रूप से निर्भर रहने के बजाय आवेदकों की नस्ल को ध्यान में रखा जाता था।

विभाग की जांच में पाया गया कि एडमिशन स्टाफ आवेदकों के मुश्किल हालात वाले सवालों के जवाबों का इस्तेमाल करता था। इन सवालों का मकसद उम्मीदवारों को अपनी निजी चुनौतियों के बारे में बताने का मौका देना था, लेकिन इनका इस्तेमाल ऐसे लोगों की पहचान करने के लिए किया गया जिन्हें मेडिसिन में कम प्रतिनिधित्व वाली अल्पसंख्यक आबादी माना जाता है। इस श्रेणी में अश्वेत और हिस्पैनिक आवेदक शामिल हैं।

जांच के नतीजों के मुताबिक, इसके बाद आवेदकों को उनके MCAT स्कोर और GPA के आधार पर समूहों में बांटा जाता था, और इंटरव्यू के फ़ैसले लेने से पहले "मुश्किल हालात" वाले अतिरिक्त उप-समूह बनाए जाते थे।

न्याय विभाग ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फ़ैसले के बाद कुछ एडमिशन साइकल में, समीक्षा प्रक्रिया के दौरान एडमिशन रिव्यू करने वालों को आवेदकों की नस्लीय पहचान की जानकारी दी जाती थी। विभाग के अनुसार, इससे स्कूल को नस्ल-आधारित एडमिशन पर कोर्ट की रोक से बचते हुए कम प्रतिनिधित्व वाले अल्पसंख्यक आवेदकों के लिए इंटरव्यू के निमंत्रण बढ़ाने में मदद मिली।

विभाग ने कहा कि वह UC सैन डिएगो स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के साथ समझौता करने के लिए बातचीत कर रहा है ताकि उसके एडमिशन के नियम फ़ेडरल कानून के अनुरूप हो सकें। न्याय विभाग ने कहा कि अगर ये बातचीत सफल नहीं होती है, तो वह मुक़दमा दायर करने के लिए तैयार है। सिविल राइट्स डिवीजन ने कहा कि वह फेडरल सिविल राइट्स कानूनों को लागू करने की अपनी व्यापक प्रक्रिया के तहत, 'टाइटल VI' और 'स्टूडेंट्स फॉर फेयर एडमिशन' के फैसले का पालन सुनिश्चित करने के लिए कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और प्रोफेशनल स्कूलों पर नजर रखना जारी रखेगा।

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