बच्चे अपनी बनाई हुई ड्राइंग दिखा रहे हैं। / provided
80,000 से ज्यादा बच्, जिन्हें गरीबी, मजदूरी और हालात की वजह से भुला दिया गया था, चुपचाप स्कूल लौट आए हैं। ये बच्चे भारत के सबसे पिछड़े इलाकों से आने वाली पहली पीढ़ी के पढ़ने-लिखने वाले बच्चे हैं। आज वे न सिर्फ स्कूल में दाखिला ले चुके हैं, बल्कि क्लास में जा रहे हैं, सीख रहे हैं और अपना ऐसा भविष्य बना रहे हैं जो उनके माता-पिता को कभी नहीं मिल पाया। इस बदलाव के पीछे ASPIRE (A Society for Promotion of Inclusive and Relevant Education) नाम की संस्था है।
ये बच्चे क्यों पिछड़ गए थे?
मध्य भारत का आदिवासी इलाका, जो दस राज्यों में फैला है, जंगलों और खनिजों से समृद्ध है और देश के लिए बहुत ज्यादा कमाई करता है। फिर भी, यहां की ज्यादातर आदिवासी आबादी पुराने तरीके की खेती और घोर गरीबी में जी रही है। भारत की तरक्की का फायदा मिलने के बजाय, इन समुदायों का सस्ते मजदूर के तौर पर शोषण हुआ है। इससे मजबूरी में पलायन होता है, जिससे पूरे-के-पूरे गांवों के युवा बाहर चले जाते हैं।
स्कूलों की कमी, क्लासरूम में संसाधनों की कमी, पढ़ाने के असरदार तरीकों का न होना और सामाजिक भेदभाव बच्चों, खासकर लड़कियों, को बाल मजदूरी और कम उम्र में शादी की ओर धकेलते हैं। नतीजा यह होता है कि परिवार गरीबी के ऐसे चक्र में फंस जाते हैं जहां बच्चे को स्कूल भेजना परिवार को भूखा रखने जैसा लगता है।
इस चक्र को तोड़ना: CLFZ मॉडल
ASPIRE के सेक्रेटरी दया राम कहते हैं कि बाल मजदूरी सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं है। यह गरीबी की वजह से पीढ़ियों से चली आ रही एक सामाजिक प्रथा है। हमारा काम तब शुरू होता है जब हम किसी परिवार को यह समझा पाते हैं कि उनके बच्चे का भविष्य आज की कमाई से कहीं कीमती है।
ASPIRE का समाधान है 'चाइल्ड लेबर फ्री जोन' (CLFZ) मॉडल। फील्ड टीमें घर-घर जाकर सर्वे करती हैं और 'विलेज एजुकेशन रजिस्टर' (VER) बनाती हैं, जिसमें जन्म से लेकर 18 साल की उम्र तक हर बच्चे का रिकॉर्ड रखा जाता है। जो बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं, चाहे वे प्रवासी हों, लंबे समय से स्कूल छोड़ चुके हों, कुछ समय के लिए स्कूल छोड़े हों या कभी स्कूल न गए हों, उनकी पहचान की जाती है और उन्हें स्कूल से जोड़ा जाता है। किसी इलाके को CLFZ का दर्जा तभी मिलता है जब 6 से 14 साल की उम्र के सभी बच्चे तीन महीने तक औसतन 85% उपस्थिति बनाए रखें। सबसे अहम बात यह है कि समुदाय खुद CLFZ की घोषणा करता है, NGO नहीं।
आंकड़े क्या बताते हैं?
ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में काम करते हुए, ASPIRE अब तक 39 ब्लॉक, 742 ग्राम पंचायतों और 6,458 सरकारी स्कूलों में 15 लाख बच्चों तक पहुंच चुका है। आंकड़ों की जुबानी देखें तो अप्रैल 2026 तक...
ASPIRE द्वारा चलाए जा रहे रेजिडेंशियल ब्रिज कोर्स (RBC) के बच्चे / Handoutदूसरा मौका: मुख्यधारा से जुड़ने का जरिया
जो बच्चे लंबे समय से स्कूल नहीं जा रहे थे, उनके लिए ASPIRE 'रेसिडेंशियल ब्रिज कोर्स' (RBC) और 'नॉन-रेसिडेंशियल ब्रिज कोर्स' (NRBC) सेंटर चलाता है। यहां बच्चे सरकारी स्कूलों में लौटने से पहले अपनी क्लास के हिसाब से जरूरी पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। अब तक 15,000 से ज्यादा बच्चे RBC सेंटरों में जा चुके हैं और कुछ को छोड़कर बाकी सभी मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ चुके हैं।
इनमें संतोषी राय भी शामिल थीं, जो चौथी क्लास की पढ़ाई छोड़कर अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने लगी थीं। ASPIRE के एक फील्ड वर्कर ने उन्हें लड़कियों के RBC सेंटर में भर्ती कराया। बाद में उन्होंने 69वें नेशनल स्कूल गेम्स आर्चरी चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीता। उनकी कहानी अब आम बात होती जा रही है।
बदले हुए क्लासरूम: FLN, लाइब्रेरी और डिजिटल सुविधाएं
ASPIRE का 'फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी' (FLN) प्रोग्राम 5,225 प्राइमरी स्कूलों में 4,276 ट्रेंड वॉलंटियर्स की मदद से चलाया जा रहा है। इससे 3,36,054 बच्चों की पढ़ाई में सुधार हुआ है और स्कूल में बच्चों की उपस्थिति में 20–30% की बढ़ोतरी हुई है। ओडिशा प्रोजेक्ट एरिया में, अब 99.7% छात्र प्री-प्राइमरी से प्राइमरी में जा रहे हैं- जो एक दशक पहले सोचा भी नहीं जा सकता था।
फिनलैंड की तुर्कू यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर किए गए काम से क्लासरूम में पढ़ाई का 80% समय अब छात्रों की अपनी पहल से होने वाली पढ़ाई (student-led learning) में बदल गया है। इससे 1,785 मिडिल स्कूल और 2,00,000 से ज्यादा छात्र जुड़े हैं। 6,360 से ज्यादा स्कूलों में चालू हालत में लाइब्रेरी हैं और 173 'कम्युनिटी एजुकेशन रिसोर्स सेंटर' (CERCs) दूर-दराज के आदिवासी गांवों को डिजिटल दुनिया से जोड़ते हैं।
समुदाय ने ली असली जिम्मेदारी
यह बदलाव सिर्फ क्लासरूम तक ही सीमित नहीं है। ओडिशा में, 681 स्कूलों ने RTE एक्ट के तहत 'स्कूल डेवलपमेंट प्लान' जमा किए हैं, जिससे सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर फंड से लगभग 15.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि मिल पाई है। 10,402 सदस्यों वाले 549 से ज़्यादा 'गर्ल्स राइट्स प्रोटेक्शन फोरम' अब गांव के स्तर पर बाल विवाह के खिलाफ लड़ रहे हैं।
दया राम कहते हैं कि जब कोई सरपंच ग्राम सभा में खड़ा होकर अपनी पंचायत को बाल-मजदूरी मुक्त घोषित करता है, तो वही वह पल होता है जिसके लिए हम काम कर रहे होते हैं। इसका मतलब है कि समुदाय ने जिम्मेदारी ले ली है। और यह ऐसी चीज है जिसे कोई सरकारी आदेश या NGO प्रोग्राम अकेले नहीं कर सकता।
एक नया भविष्य
भारत की तरक्की से अछूते आदिवासी इलाकों में, ASPIRE एक नई कहानी लिख रहा है। हर बच्चे, हर बस्ती और हर संकल्प के साथ। जहां गरीबी को स्थायी और बाल मजदूरी को आम बात माना जाता था, वहां अब पूरे समुदाय हर बच्चे को स्कूल भेजने के लिए एकजुट हो गए हैं। यही वह खामोश क्रांति है जिसकी अगुवाई ASPIRE कर रहा है।
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