ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल संघर्ष के बीच ईरान के तेहरान में 2 मार्च 2026 को एक पुलिस स्टेशन पर इजरायली और अमेरिकी हमले के बाद एक महिला अपने बच्चे के साथ देखते हुए / Majid Asgaripour/WANA (West Asia News Agency) via REUTERS
महाशक्तियां शायद ही कभी उन कारणों से युद्ध करती हैं जिन्हें वे सार्वजनिक रूप से बताती हैं। उनके आधिकारिक बयान आमतौर पर प्रतिरोध, परमाणु प्रसार या फिर सहयोगियों की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि महाशक्तियों की असली वजह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के संरचनात्मक दबावों की वजह से छिपी होती हैं।
पेलोपोनेसियन युद्ध केवल एथेंस और स्पार्टा के बीच विवाद नहीं था बल्कि स्पार्टा के एथेंस के उभार से पैदा हुए भय का परिणाम था। बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन का साम्राज्यवादी जर्मनी से टकराव औद्योगिक और नौसैनिक प्रतिस्पर्धा को लेकर चिंताओं को दर्शाता था। शीत युद्ध भी अपने वैचारिक शब्दों के बावजूद मूल रूप से भू-राजनीतिक और तकनीकी प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा था।
संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच उभरते युद्ध को भी इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
सार्वजनिक रूप से वॉशिंगटन इस संघर्ष को ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं, मिसाइल कार्यक्रमों और क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क के संदर्भ में पेश करता है। ये चिंताएं वास्तविक हैं। लेकिन वे इस टकराव के पैमाने या समय को पूरी तरह नहीं समझातीं। इसके पीछे का तर्क गहरा है जोकि वैश्विक राजनीति में हो रहे एक बड़े संरचनात्मक बदलाव में है। वो है संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच तेज होती प्रतिस्पर्धा।
इस प्रतिस्पर्धा में ईरान केवल एक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी नहीं है। यह वैश्विक ऊर्जा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण केंद्र है जो इक्कीसवीं सदी की तकनीकी शक्ति को आधार देता है।
यथार्थवाद की वापसी
शीत युद्ध के बाद तीन दशकों तक अमेरिकी विदेश नीति एक मजबूत धारणा पर आधारित थी कि आर्थिक वैश्वीकरण धीरे-धीरे एक स्थिर और सहयोगी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पैदा करेगा। उभरती शक्तियों को वैश्विक बाजारों में शामिल करने से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कम होने की उम्मीद की गई थी।
पिछले तीस वर्षों में अमेरिकी कंपनियों ने अपने विनिर्माण का बड़ा हिस्सा चीन में स्थानांतरित कर दिया, जिससे चीन दुनिया का औद्योगिक केंद्र बन गया। हालांकि एक सहयोगी साझेदार बनने के बजाय इस प्रक्रिया ने एक ऐसा प्रतिस्पर्धी पैदा किया जिसके पास आर्थिक पैमाना और तकनीकी महत्वाकांक्षा दोनों हैं जो अमेरिकी नेतृत्व को चुनौती दे सकती हैं।
यह पुनर्मूल्यांकन राजनीतिक वैज्ञानिक जॉन मियरशाइमर द्वारा प्रस्तुत ‘ऑफेंसिव रियलिज्म’ सिद्धांत से मेल खाता है। मियरशाइमर के अनुसार अराजक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में महाशक्तियां दूसरों की सद्भावना पर भरोसा नहीं कर सकतीं। अस्तित्व के लिए उन्हें संभावित प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले अपनी शक्ति को अधिकतम करना पड़ता है।
इस दृष्टिकोण से देखें तो अमेरिका का रणनीतिक बदलाव आश्चर्यजनक नहीं है। चीन के उभार का सामना करते हुए वॉशिंगटन ने एक प्रकार का संप्रभु सुधार शुरू किया है जिसमें ऊर्जा, उद्योग और तकनीकी क्षमता में संरचनात्मक बढ़त को फिर से स्थापित करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है।
ईरान के साथ टकराव को इसी व्यापक पुनर्संतुलन के भीतर देखा जाना चाहिए।
ईरान और ऊर्जा शक्ति का भूगोल
वैश्विक ऊर्जा प्रणाली में ईरान की स्थिति बेहद रणनीतिक है। यह देश होरमुज जलडमरूमध्य के पास स्थित है। यह एक संकरा समुद्री मार्ग है जिससे होकर दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल गुजरता है। इस मार्ग में किसी भी तरह की रुकावट तुरंत वैश्विक बाजारों को प्रभावित करती है। लेकिन ईरान का महत्व केवल भौगोलिक नहीं है।
हाल के वर्षों में चीन ईरानी तेल का मुख्य खरीदार बन गया है। अक्सर यह तेल रियायती कीमतों पर खरीदा जाता है, जो पश्चिमी प्रतिबंधों को दरकिनार करता है। यह ऊर्जा आपूर्ति चीन की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को सहारा देती है और तेहरान को एक महत्वपूर्ण आर्थिक जीवनरेखा प्रदान करती है।
यह संबंध प्रभावी रूप से ईरान को चीन की दीर्घकालिक रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं से जोड़ देता है। वॉशिंगटन के दृष्टिकोण से यह एक संरचनात्मक समस्या पैदा करता है। अगर चीन अमेरिका का प्रमुख भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है, तो चीन के औद्योगिक विस्तार को सहारा देने वाले ऊर्जा नेटवर्क स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र बन जाते हैं।
ऊर्जा–एआई संबंध
ऊर्जा हमेशा से भू-राजनीतिक शक्ति का आधार रही है। लेकिन इक्कीसवीं सदी में इसका महत्व तकनीकी क्षेत्र तक फैल गया है।
एआई आने वाले दशकों की निर्णायक तकनीक है जो विशाल कम्प्यूटिंग ढांचे पर निर्भर करती है। बड़े एआई मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए विशाल डेटा सेंटर चाहिए जिनमें उन्नत प्रोसेसर होते हैं और जो बहुत अधिक बिजली का उपयोग करते हैं।
सेमीकंडक्टर निर्माण संयंत्रों को स्थिर ऊर्जा आपूर्ति चाहिए। उच्च-प्रदर्शन कम्प्यूटिंग क्लस्टर लगातार चलते रहते हैं। डिजिटल अवसंरचना की बिजली मांग अब भारी उद्योगों के बराबर होती जा रही है।
इसलिए रणनीतिक समीकरण स्पष्ट है: ऊर्जा → कम्प्यूटिंग → कृत्रिम बुद्धिमत्ता → शक्ति
जो देश प्रचुर और विश्वसनीय ऊर्जा सुरक्षित कर लेंगे उन्हें एआई क्षमता विकसित करने में निर्णायक बढ़त मिलेगी। क्योंकि एआई सैन्य प्रणालियों, आर्थिक उत्पादकता और साइबर युद्ध को प्रभावित कर रही है, इसलिए ऊर्जा प्रवाह पर नियंत्रण अंततः भू-राजनीतिक प्रभाव में बदल जाता है।
ऊर्जा अब केवल परिवहन या उद्योग का ईंधन नहीं है। यह कम्प्यूटेशनल संप्रभुता का ईंधन बन चुकी है।
वेनेजुएला–ईरान–चीन त्रिकोण
जब इस दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो मध्य पूर्व और पश्चिमी गोलार्ध में हाल के अमेरिकी कदम एक स्पष्ट पैटर्न बनाते दिखाई देते हैं। दुनिया के दो सबसे बड़े तेल भंडार ऐसे देशों में हैं जो ऐतिहासिक रूप से वॉशिंगटन के विरोधी रहे हैं ईरान और वेनेजुएला। इन दोनों सरकारों ने चीन के साथ आर्थिक संबंध मजबूत किए हैं और रियायती तेल उपलब्ध कराया है जो बीजिंग के औद्योगिक विस्तार को सहारा देता है।
इससे एक रणनीतिक त्रिकोण बनता है:
• ईरान फारस की खाड़ी में ऊर्जा प्रवाह को नियंत्रित करता है।
• वेनेजुएला पश्चिमी गोलार्ध के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार पर नियंत्रण रखता है।
• चीन मुख्य बाहरी उपभोक्ता है जो इन ऊर्जा उत्पादकों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ता है।
ईरान का सामना करके और वेनेजुएला में राजनीतिक परिवर्तन की कोशिश करके अमेरिका इस त्रिकोण को बदलने की कोशिश कर रहा है। उद्देश्य केवल क्षेत्रीय स्थिरता नहीं है। उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा प्रवाह को इस तरह पुनर्गठित करना है कि चीन की रणनीतिक बढ़त सीमित हो जाए।
संसाधन रणनीति से मिलने वाले ऐतिहासिक सबक
इतिहास में कई उदाहरण मिलते हैं जब महाशक्तियों ने अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण संसाधनों पर नियंत्रण किया।
प्रथम विश्व युद्ध से पहले के वर्षों में ब्रिटेन को साम्राज्यवादी जर्मनी के उभार का सामना करना पड़ा। जर्मनी एक शक्तिशाली औद्योगिक और नौसैनिक प्रतिस्पर्धी बन रहा था। ब्रिटेन की प्रतिक्रिया केवल कूटनीति या गठबंधनों तक सीमित नहीं थी। ब्रिटिश सरकार ने वैश्विक समुद्री मार्गों और ऊर्जा संसाधनों को सुरक्षित करने के लिए आक्रामक कदम उठाए। इसमें फारस से तेल आपूर्ति में भारी निवेश भी शामिल था, ताकि रॉयल नेवी को कोयले से तेल पर स्थानांतरित किया जा सके। ऊर्जा और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण ब्रिटेन की रणनीतिक बढ़त बनाए रखने के लिए जरूरी बन गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी रणनीति भी इसी तर्क से प्रेरित थी। 1941 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने साम्राज्यवादी जापान पर व्यापक तेल प्रतिबंध लगा दिया। इससे टोक्यो की लगभग 80 प्रतिशत पेट्रोलियम आपूर्ति कट गई। यह प्रतिबंध जापान के पूर्वी एशिया में विस्तार को रोकने के लिए लगाया गया था, क्योंकि उसकी सैन्य मशीन को चलाने के लिए ऊर्जा संसाधन आवश्यक थे। जापान का पर्ल हार्बर पर हमला आंशिक रूप से इस रणनीतिक दबाव का परिणाम था।
ये उदाहरण भू-राजनीति का एक स्थायी सिद्धांत दिखाते हैं: ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण वैश्विक संघर्षों की दिशा तय कर सकता है।
व्यवहार में रणनीतिक यथार्थवाद
उभरती अमेरिकी नीति इसी ऐतिहासिक तर्क की ओर वापसी को दर्शाती है। दशकों तक अमेरिकी विदेश नीति को उदार अंतरराष्ट्रीयवाद की भाषा में प्रस्तुत किया जाता रहा है जैसे लोकतंत्र का प्रसार, मानवीय हस्तक्षेप और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का संरक्षण। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मूल तंत्र नहीं बदले हैं। राज्य अभी भी शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
चीन जैसे उभरते प्रतिस्पर्धी का सामना करते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका अब पारंपरिक भू-राजनीतिक रणनीति के अनुरूप कदम उठा रहा है: ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करना, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को पुनर्गठित करना और तकनीकी नेतृत्व बनाए रखना। इस संदर्भ में ईरान के साथ युद्ध कम असामान्य और अधिक पूर्वानुमेय दिखाई देता है।
इक्कीसवीं सदी की बाजी
संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा संभवतः आने वाले दशकों में वैश्विक व्यवस्था को परिभाषित करेगी। लेकिन शीत युद्ध के विपरीत यह प्रतिस्पर्धा मुख्य रूप से वैचारिक नहीं है। यह तकनीकी और आर्थिक है। एआई, उन्नत कम्प्यूटिंग और डिजिटल अवसंरचना राष्ट्रीय शक्ति के निर्णायक उपकरण बनते जा रहे हैं।
फिर भी ये तकनीकें अंततः भौतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। बिजली ग्रिड, तेल क्षेत्र, समुद्री मार्ग और ऊर्जा गलियारे अब भी भू-राजनीतिक प्रभाव की नींव हैं। इसलिए ईरान के साथ युद्ध डिजिटल युग की एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है: सबसे उन्नत तकनीकें भी भौतिक दुनिया से जुड़ी रहती हैं।
युद्ध का अनकहा तर्क
युद्ध शायद ही कभी किसी एक कारण से लड़े जाते हैं। लेकिन कभी-कभी असली कारण हमारी आंखों के सामने ही छिपा होता है। ईरान के साथ टकराव आधिकारिक रूप से परमाणु हथियारों, क्षेत्रीय मिलिशिया और अमेरिकी सहयोगियों की सुरक्षा से जुड़ा बताया जाता है। लेकिन इन कारणों के पीछे एक कहीं अधिक महत्वपूर्ण गणना छिपी है।
ईरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारों में से एक पर स्थित है। उसका तेल तेजी से अमेरिका के प्रमुख भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की औद्योगिक वृद्धि को सहारा दे रहा है। और ऐसे समय में जब ऊर्जा एआई को शक्ति देती है और एआई वैश्विक शक्ति को आकार देती है। ऐसे में ऊर्जा प्रणालियों पर नियंत्रण एक रणनीतिक आवश्यकता बन गया है।
इस दृष्टिकोण से देखें तो ईरान के साथ युद्ध केवल ईरान के बारे में नहीं है। यह इक्कीसवीं सदी में शक्ति संतुलन के भविष्य के बारे में है। और जब यह तर्क स्पष्ट हो जाता है तो यह संघर्ष एक क्षेत्रीय संकट कम और एक बहुत बड़े संघर्ष के शुरुआती अध्याय जैसा अधिक दिखाई देता है।
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