USCIRF का लोगो / USCIRF
अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने 4 मार्च को अपनी 2026 की वार्षिक रिपोर्ट जारी की। इसके बाद अमेरिका और विदेशों में विवाद खड़ा हो गया। भारत जैसे देशों ने इस रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण और प्रेरित बताया जबकि अमेरिका के भीतर आलोचना नीतियों को लेकर हुई। इन विवादों से यह सवाल उठता है कि क्या यह संस्था अब भी जरूरी है और क्या इसे इसी रूप में जारी रहना चाहिए।
सबसे पहले जान लेते हैं कि USCIRF है क्या?
अमेरिकी संसद ने 1998 में एक कानून के तहत इस आयोग को बनाया था। इसका काम दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर नजर रखना है। इस आयोग में 9 सदस्य होते हैं। यह अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करता है और राष्ट्रपति, विदेश मंत्री और संसद को सुझाव देता है। यह कुछ देशों को खास निगरानी सूची में डालने की सिफारिश भी करता है। गंभीर उल्लंघन करने वाले देशों को 'विशेष चिंता वाले देश' कहा जाता है। कम लेकिन गंभीर उल्लंघन करने वालों को अलग सूची में रखा जाता है। आयोग 'गंभीर उल्लंघन' को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है इसमें यातना, बिना आरोप के लंबी हिरासत, लोगों का गायब होना और जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ी बड़ी बाधाएं शामिल हैं।
लेकिन समय के साथ यह आयोग कमजोर और पक्षपातपूर्ण हो गया है। यह धार्मिक तनाव का कारण भी बनता है। आयोग की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। विदेश मंत्रालय अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देता है। इससे इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। विदेश मंत्रालय अपनी अलग जानकारी और विश्लेषण के आधार पर फैसले करता है। उदाहरण के लिए, 2025 में आयोग की कई सिफारिशों को नजरअंदाज किया गया। दोनों के आकलन में अक्सर अंतर होता है। अगर सरकार आयोग की सिफारिश मान भी ले तब भी कार्रवाई जरूरी नहीं होती। उदाहरण के तौर पर पाकिस्तान को सूची में तो रखा गया लेकिन उस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए।
अमेरिका की राजनीति का असर भी इस आयोग पर पड़ता है। नाइजीरिया को आयोग 2009 से गंभीर श्रेणी में डालने की सिफारिश करता रहा लेकिन 2020 में ऐसा किया गया। हालांकि 2021 में इसे हटा दिया गया। फिर 2025 में फिर से नाइजीरिया को जोड़ा गया। इससे पता चलता है कि फैसले राजनीति से प्रभावित होते हैं।
आयोग के अंदर भी राजनीतिक मतभेद दिखते हैं। सरकारी सहायता कार्यक्रमों में कटौती पर अलग-अलग राय सामने आई हैं। एक और समस्या है और वो है आयोग की संरचना। आलोचकों का कहना है कि इसमें विविध धर्मों का सही प्रतिनिधित्व नहीं है। इससे कई दृष्टिकोण नजरअंदाज हो जाते हैं। यह संस्था मानवाधिकारों की एक अंतरराष्ट्रीय घोषणा के आधार पर काम करती है। यह घोषणा सोच, अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता की बात करती है। यह धर्म बदलने और उसे खुले रूप से मानने का अधिकार देती है लेकिन इसमें अपने धर्म को बनाए रखने का अधिकार स्पष्ट नहीं है।
जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन और यहूदी धर्म प्रचार नहीं करते तो इनके अनुयायियों की रक्षा के प्रयासों को गलत समझा जाता है। भारत के संदर्भ में धर्म परिवर्तन से जुड़े कानूनों को नकारात्मक बताया गया था। यह समझ की कमी को दिखाता है। आलोचकों का कहना है कि आयोग में इन धर्मों का प्रतिनिधित्व नहीं है। 9 सदस्यों में से कोई भी इन परंपराओं से नहीं आता और न ही किसी के पास तुलनात्मक धर्म का गहरा ज्ञान है।
भारतीय मूल के लोगों ने इस कमी पर सवाल उठाए हैं। आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि रिपोर्ट में ठोस और व्यापक सबूतों की कमी है। कई बार चुनिंदा घटनाओं के आधार पर पूरे देश का चित्रण किया जाता है। एक विशेषज्ञ ने कहा कि आयोग के पास जांच करने की अपनी व्यवस्था नहीं है। यह अक्सर अन्य संगठनों की जानकारी पर निर्भर करता है। रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की भी कमी है। यह साफ नहीं होता कि किन घटनाओं को शामिल किया गया।
एक संचार विशेषज्ञ ने इस पर चिंता जताई है। उन्होंने पहले अमेरिकी संसद के नेताओं के साथ काम किया है। एक प्रोफेसर ने कहा कि यह संस्था अब पुरानी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि इसका बजट बड़ा है लेकिन काम का असर कम है। उनके अनुसार इस संस्था को पहले ही बंद कर देना चाहिए था लेकिन इसे चालू रखा गया। इससे ऐसे लोग इसमें बने हुए हैं जिन पर राजनीतिक असर साफ दिखता है।
लेखक कैलिफोर्निया न्यू पब्लिशर्स एसोसिएशन और सैन फ्रांसिस्को प्रेस क्लब के पत्रकारिता पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।
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