Salim Durrani / ICC
भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाना किसी भी दौर में किसी भी क्रिकेटर के लिए आसान नहीं रहा है। यह तब और मुश्किल है, जब आप किसी दूसरे मुल्क के हों और वहां क्रिकेट एक प्रमुख खेल न हो, लेकिन जहां जुनून होता है, वहां हर सपना सच किया जा सकता है। सलीम दुर्रानी की कहानी ऐसी है।
सलीम दुर्रानी का ताल्लकु अफगानिस्तान से था। उनका जन्म 11 दिसंबर 1934 को खैबर दर्रा में हुआ था। उनके पिता अब्दुल अजीज दुर्रानी एक पेशेवर क्रिकेटर थे। 1935 में कराची के अपने दौरे पर, नवानगर (आज का जामनगर) के लिए उनके विकेट-कीपिंग और बैटिंग परफॉर्मेंस से प्रभावित होकर, अब्दुल अजीज को उस समय के जाम साहिब दिग्विजयसिंह रणजीतसिंह ने सब-इंस्पेक्टर की नौकरी का ऑफर दिया।
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यही वह समय था जब दुर्रानी परिवार जामनगर में बस गया। सलीम तीन साल की उम्र में अपने माता-पिता के साथ भारत आ गए थे। 1947 में भारत के बंटवारे के बाद, अजीज पाकिस्तान चले गए, जबकि उनका परिवार जामनगर में ही रहा।
दुर्रानी एक ऑलराउंडर थे। वह एक धीमे बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स गेंदबाज और बाएं हाथ के बल्लेबाज थे जो अपने छक्के मारने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध थे। अफगानिस्तान में जन्मे और भारतीय टीम के लिए खेलने वाले एकमात्र क्रिकेटर दुर्रानी ने 1960 में भारतीय टीम के लिए डेब्यू किया था और फरवरी 1973 तक 29 टेस्ट मैचों का हिस्सा रहे। इस दौरान 50 पारियों में 1 शतक और 7 अर्धशतक लगाते हुए उन्होंने 1202 रन बनाए और 75 विकेट लिए।
दुर्रानी 1961-62 में इंग्लैंड के खिलाफ भारत की सीरीज जीत के हीरो थे। उन्होंने कोलकाता और चेन्नई में मिली जीत में क्रमशः 8 और 10 विकेट लिए। इसके अलावा, एक दशक बाद, उन्होंने पोर्ट ऑफ स्पेन में वेस्टइंडीज के खिलाफ भारत की पहली जीत में अहम भूमिका निभाई, जिसमें उन्होंने क्लाइव लॉयड और गैरी सोबर्स के विकेट लिए।
सलीम दुर्रानी अर्जुन पुरस्कार जीतने वाले पहले क्रिकेटर थे। 2011 में, उन्हें सी. के. नायडू लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया, जो भारतीय क्रिकेट बोर्ड द्वारा किसी पूर्व खिलाड़ी को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है।
सलीम दुर्रानी की 2 अप्रैल 2023 को 88 साल की उम्र में कैंसर से मौत हो गई।
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