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'कृष्णमूर्ति हारे हैं पर रुके नहीं भारतीय-अमेरिकी सियासी सपने'

इस हार के बाद भारतीय अमेरिकी समुदाय में निराशा देखी जा रही है। दरअसल, 2016 से वह कैपिटल हिल पर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक प्रमुख आवाज रहे हैं और समुदाय के मजबूत समर्थक माने जाते हैं।

 राजा कृष्णमूर्ति राजा कृष्णमूर्ति / NIA

राजा कृष्णमूर्ति ने इलिनॉय के 8वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के लिए जितने भी आम चुनाव लड़े, सभी में जीत हासिल की। लेकिन इस हफ्ते उनका यह सिलसिला टूट गया। वह इलिनॉय से अमेरिकी सीनेट की डेमोक्रेटिक प्राइमरी में हार गए। यह सीट सेवानिवृत्त हो रहे सीनेटर डिक डर्बिन की थी। राजा को राज्य की लेफ्टिनेंट गवर्नर जूलियाना स्ट्रैटन ने हराया है।

हाई प्रोफाइल अभियान और भारी फंडिंग के बावजूद कृष्णमूर्ति सीनेटर बनने की दौड़ में सफल नहीं हो सके। उन्हें 'समोसा कॉकस' के लिए भी जाना जाता है जोकि अमेरिकी हाउस में भारतीय अमेरिकी प्रतिनिधियों के समूह को दर्शाता है। इस हार के बाद भारतीय अमेरिकी समुदाय में निराशा देखी जा रही है। दरअसल, 2016 से वह कैपिटल हिल पर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक प्रमुख आवाज रहे हैं और समुदाय के मजबूत समर्थक माने जाते हैं।

इस पर इंडियास्पोरा के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर संजीव जोशीपुरा ने कहा कि यह राष्ट्रीय सार्वजनिक जीवन में भारतीय अमेरिकी समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिहाज से एक झटका है। चाहे किसी की भी राजनीतिक सोच हो, मेरा मानना है कि अगर कृष्णमूर्ति सीनेट में होते तो पूरे समुदाय को फायदा होता। लेकिन हमें इस एक हार को इतना बड़ा नहीं बनने देना चाहिए कि इससे यह तथ्य छिप जाए कि भारतीय अमेरिकी समुदाय में सभी स्तरों पर खासकर जमीनी स्तर पर राजनीतिक भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

कई लोग इस हार को आत्ममंथन का अवसर मानते हैं न कि पीछे हटने का संकेत। सिलिकॉन वैली के एग्जीक्यूटिव ऋषि कुमार ने कहा कि उनका अभियान उन लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो सेवा, मेहनत और इस देश के वादे पर विश्वास करते हैं। भारतीय अमेरिकी समुदाय अमेरिका की सफलता में गहराई से जुड़ा हुआ है। व्यापार, सार्वजनिक सेवा, तकनीक, चिकित्सा और शिक्षा हर क्षेत्र में भारतीय अमेरिकी आगे बढ़ रहे हैं और योगदान दे रहे हैं।

कुमार का मानना है कि यह सिर्फ एक चुनाव की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि यह एक बढ़ता हुआ आंदोलन है। शहर परिषदों से लेकर राज्य विधानसभाओं, सामुदायिक बोर्डों से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक अधिक भारतीय अमेरिकी ईमानदारी, उद्देश्य और देश को मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता के साथ आगे आ रहे हैं।

1973 में नई दिल्ली में जन्मे कृष्णमूर्ति बचपन में अपने परिवार के साथ अमेरिका चले गए थे। उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक और हार्वर्ड लॉ स्कूल से कानून की डिग्री हासिल की। कांग्रेस में आने से पहले उन्होंने कानूनी, निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में काम किया और 2004 में बराक ओबामा के अमेरिकी सीनेट अभियान में नीति निदेशक भी रहे।

जोशीपुरा ने कहा कि ज्यादातर भारतीय अमेरिकी मानेंगे कि उन्होंने हमेशा अपनी पृष्ठभूमि, विरासत और मूल्यों को गर्व से अपनाया। इससे समुदाय में यह भावना मजबूत हुई कि हमें भी अमेरिकी राजनीति में शीर्ष स्तर पर जगह मिलनी चाहिए। उन्होंने अपनी पहचान को पूरी तरह स्वीकार किया, बिना संकीर्णता के और व्यापक अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाए बिना। यही वह नेतृत्व है जिसकी हमारे समुदाय को जरूरत है।

कृष्णमूर्ति वर्तमान में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सदस्य हैं और अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चयन समिति में रैंकिंग सदस्य के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनका कार्यकाल जनवरी 2027 तक जारी रहेगा।

दिल्ली स्थित थिंक टैंक इमेजइंडिया इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष रॉबिंदर सचदेव का मानना है कि आने वाले महीनों में हाउस में उनके लिए चुनौतियां होंगी। उन्होंने कहा कि अगर वह अपने काम से प्रभाव बनाए रखते हैं और सक्रिय बने रहते हैं तो वह 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक अभियान का हिस्सा बन सकते हैं और एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हालांकि सचदेव भी इसे बड़ा झटका नहीं मानते। उन्होंने कहा कि पिछले चुनाव चक्र में 300 से अधिक भारतीय अमेरिकियों ने संघीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर चुनाव लड़ा था, और 2026 के मिडटर्म चुनाव में यह संख्या लगभग 400 तक पहुंचने की संभावना है।

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