माउंट रेनियर: जहां प्रकृति ने बाहें फैलाकर स्वागत किया / Tapasya Chaubey
अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में कैस्केड पर्वतमाला में स्थित एक विशाल और सक्रिय स्ट्रैटोज्वालामुखी है। 14,410 फीट की ऊंचाई के साथ यह वाशिंगटन और कैस्केड रेंज का सबसे ऊंचा पर्वत है। इस पर्वत का नाम 'माउंट रेनियर' है। अलास्का के अलावा अमेरिका में सिर्फ इसी एक पर्वत पर सबसे बड़ा हिमनद है। यहां के गाइड के अनुसार इसमें दो दर्जन से भी अधिक ग्लेशियर शामिल है।
हमारी फ्लाईट पोर्टलैंड तक थी। पोर्टलैंड से माउंट रेनियर की दूरी करीब ढाई घंटे बाई कार है। वहीं सिएटल से करीब डेढ़ घंटे। हमारे यहां से सिएटल की एक तो फ्लाइट टिकट बहुत महंगी पड़ रही थी उसपर टाइम भी ज्यादा लग रहा था। सिएटल और पोर्टलैंड दोनों ही फ्लाइट का ले ओवर शिकागो में था और बनिस्पत पोर्टलैंड का ले ओवर कम समय का था। हमने बजट और ज्यादा देर एयरपोर्ट पर ना रुकने का सोच कर पोर्टलैंड की फ्लाइट टिकट ले ली। अब सोचे अनुसार हर बार हो यहां-कहां होता है… हमारी प्लानिंग की पहली सीढ़ी मौसम की भेट चढ़ते-चढ़ते बची। शुक्र है फ्लाइट कैंसिल नहीं हुई। लेकिन ले ओवर का टाइम ढाई घंटे से बढ़ कर पांच घंटे से कुछ ज्यादा हो गया। बच्चों के साथ ज्यादा देर का ले ओवर मुझे बिल्कुल पसंद नहीं पर बात अब मेरे पसंद से बाहर थी। मेरे बच्चों के साथ बाकी दूसरे बच्चें भी वेटिंग एरिया को प्ले ग्राउंड बना चुके थें। रात के बीच पारदर्शी शीशे और चमचमाती रौशनी के बीच आती-जाती उड़ान को देखते और ओऽऽऽ, वाउ चिल्लाते। इधर मैं मुराकामी की वेक्शन, किताब पढ़ने की नाकाम कोशिश कर रही थी। हर कुछ देर में मेरा ध्यान बच्चों पर जाता की वे सही जगह पर हैं ना, कहीं दौड़ते हुए आगे ना चले जाए। खैर हम तय समय से काफी लेट पोर्टलैंड एयरपोर्ट पर पहुँचे। उसके बाद जो दुर्गति हुई वह इस यात्रा सीरिज में जारी रहेगी। फ़िलहाल माउंट रेनियर पहुंचते हैं।
पोर्टलैंड से माउंट रेनियर के लिए हम करीब दो बजे निकले। यहाँ रेनियर माउंट के अलावा कुछ झरने और एक मिरर लेक देखना था। हमने बिना ब्रेक लिए ढाई घंटे में यहां पहुंचे। यह पार्क रात भर खुला रहता है पर बच्चों के साथ हम ज्यादा रात तक रुकना नहीं चाह रहे थे। सोचा था 9बजे तक आसमान तारों से ढक जाएगा। वह नजारा देख कर होटल की तरफ चल पड़ेंगे। खैर उस दिन सूरज ही 9 बजे तक डूबा। तारों का अभी कोई पता ना था। बच्चें चलो-चलो किए जा रहे थे और इस बार फिर मेरी पसंद की बात रह गई।
इस बीच एक अच्छी बात यह रही की दिन के तीन बजे के बाद पहुचने से हमने पार्क की गेट पर ज़्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ा। आधे घंटे में हम पार्क के अंदर। सुबह के वक़्त दो-दो घंटे का इंतज़ार करना पड़ता है। पार्क की इंट्री फी 30 डॉलर है। यहां आप चाहे तो पूरा एक दिन आराम से घूमते बिता सकतें हैं पर हम आधा दिन ही दे पाए। एक झरने के बाद जो सबसे महत्वूर्ण है , माउंट रेनियर का, “पैराडाइज क्षेत्र” वह देखा।
पैराडाइड सच में स्वर्ग है। यहां तक हम पहाड़ी रास्ते से होते हुए एक पार्किंग एरिया तक पहुंचे जो ऐसा लग रहा था बादलों के बीच बना हो। इस क्षेत्र की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 5,400 फीट है। पार्किंग के सामने लॉज और पब्लिक वॉशरूम हैं। सामने माउंट रेनियर जिसकी छोटी यहां तक आते वक़्त लगभग हर तरह से दिख रही थी। पर अब और क़रीब थी। दिखती इतना क़रीब की मन हो आया बाहों में भर लूं। मन और प्रकृति दोनों अल्हड़…
माउंट रेनियर को बाहों में नहीं भर सकती थी पर उसके ज़्यादा क़रीब उसी पैराडाइज ट्रेलहेड से पहुँचाजा सकता था। बर्फ से ढकी चोटी, फिसलती बर्फभरी ट्रेल और साथ में दो छोटे बच्चें। हमने पूरी तैयारी की। जैकेट के अलावा टोपी, दस्ताने सब पहन कर चल पड़े। मीठी धूप की वजह से बर्फ पिघल रही थी जो रास्ते को और चौक बना रही थी। कई लोग फिसल कर गिर जाते और फिर हंसते-संभलते धीरे-धीरे आगे बढ़ते जाते। वहीं कई लोग स्कीइंग की तैयारी से आए थे और इन रस्तों पर दौड़ते हुए आगे बढ़ रहे रहें। मेरे बच्चे को वहीं किनारें पेड़ों के नीचे कुछ लकड़ियां दिखीं और वह स्कीइंग स्टिक की नक़ल के लिए दो लकड़ी चुन लाया। उन दो लकड़ियों ने हमने गिरने नहीं दिया। क़रीब एक घंटा चलने के बाद हम एक ऐसी जगह पहुंचे जहां से रेनियर हमारे सामने खड़ा था। हम थक कर एक पत्थर पर बैठे थे की कई लोग लौटते दिखे जो अभी थोड़ी ही देर पहले यहां से गुजरे थें। हमने एक कपल को रोका और पूछा- क्या हुआ ?
उन्होंने बताया वहां से नजारा और सुंदर है पर हम हम आधे में लौट आए कारण नीचे की तरफ़ से रास्ता ऊपर को जा रहा है और बर्फ़ के कारण फिसलन और कीचड़ बन गया है। उन्होंने हमें बच्चों के साथ ना जाने की सलाह दी। ख़ास कर छोटे वाले के साथ। इस बार मैं एकदम क़रीब पहुंच कर लौटना नहीं चाह रही थी और साथी से कहा- आप यहां बच्चों के साथ रुकिए मैं देख आती हूं, फिर आप जाइएगा। मेरा जाना सुनकर बड़ा बेटा जिद्द कर बैठा की वह भी जाएगा और इस तरह मेरा जाना भी रह गया। जाना क्या रहा की मन में कसक रह गई पूरे रास्ते। अब सोचती हूं, हम सही-सलामत घूम कर, इतनी खट्टी-मीठी यादें लेकर तो लौटे हैं। जो रह गया उसका अफ़सोस क्यो? जिंदगी ना जाने कब फिर जाने का मौक़ा दे दे। ना भी दे, पर वह कसक, ठंड के बीच अचानक ऊपर इतनी मीठी धूप की मन गर्माहट स्व भर उठा था वह अनुभव मुझे छीन नहीं सकती। उस वक़्त ऐसा लगा जैसे, माउंट रेनियर ने अपना ध्वल, सारी ऊर्जा और प्रेम मुझपर न्योछावर कर दिया हो और मैं इस आनंद से भरी उसे निहार रही हूं।
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