आकांक्षा जैन को क्रोनिक पेन और इम्यून सिस्टम के बीच आपसी संबंधों पर उनकी रिसर्च के लिए 'रीटा एलन फाउंडेशन स्कॉलर' के तौर पर चुना गया है। / Aakanksha Jain/X
भारतीय मूल की वैज्ञानिक आकांक्षा जैन को प्रतिष्ठित '2026 रीटा एलन फाउंडेशन स्कॉलर्स अवॉर्ड' पाने वाले सात लोगों में शामिल किया गया है। आकांक्षा यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन में इम्यूनोलॉजी की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। फाउंडेशन का यह प्रोग्राम पूरे अमेरिका में होनहार और शुरुआती करियर वाले बायोमेडिकल रिसर्चर्स को सपोर्ट करता है।
रीटा एलन फाउंडेशन ने 11 जून को स्कॉलर्स के नए ग्रुप की घोषणा की। इसमें उन रिसर्चर्स को पहचाना गया है जिनके काम से न्यूरोसाइंस, कैंसर, इम्यूनोलॉजी और दर्द के इलाज में बड़ी प्रगति हो सकती है। अवॉर्ड पाने वालों को हाई-रिस्क और हाई-इम्पैक्ट वाली वैज्ञानिक रिसर्च करने के लिए पांच साल तक हर साल $110,000 तक की ग्रांट मिलती है।
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जैन ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी वारंगल से इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री हासिल की और फिर यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर से PhD पूरी की। उन्हें क्रोनिक पेन (लंबे समय तक रहने वाले दर्द) में इम्यून सिस्टम की भूमिका की जांच करने वाले उनके काम के लिए चुना गया।
उनकी रिसर्च T सेल्स पर केंद्रित है। T सेल्स ऐसे इम्यून सेल्स हैं जो आम तौर पर इन्फेक्शन और कैंसर से लड़ने के लिए जाने जाते हैं, और न्यूरोपैथिक पेन में भी इनकी भूमिका होती है। जैन की लैब ने पाया है कि T सेल्स डैमेज नसों में घुस जाते हैं और ऑटोइम्यून बीमारियों जैसी विशेषताएं दिखाते हैं। इससे यह संभावना बनती है कि नसों की चोट ऑटोइम्यून-जैसी प्रतिक्रियाओं को ट्रिगर कर सकती है, जिससे लंबे समय तक दर्द बना रहता है।
फाउंडेशन द्वारा जारी एक बयान में जैन ने कहा कि हमारा लक्ष्य ऑटोइम्यून बीमारी की रिसर्च के सिद्धांतों को लागू करके न्यूरोपैथिक पेन के मैकेनिज्म को समझना है, ताकि लंबे समय में क्रोनिक पेन के लिए इम्यून-बेस्ड थेरेपी विकसित की जा सकें।
उन्होंने कहा कि इस अवॉर्ड से उन्हें इम्यूनोलॉजी और न्यूरोसाइंस के संगम पर महत्वाकांक्षी रिसर्च करने का मौका मिलेगा। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसे पारंपरिक फंडिंग तरीकों से सपोर्ट करना अक्सर मुश्किल होता है।
2026 के इस ग्रुप में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, सैन फ़्रांसिस्को; कोलंबिया यूनिवर्सिटी; कॉर्नेल यूनिवर्सिटी; कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी; स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी; और सिनसिनाटी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल मेडिकल सेंटर जैसे संस्थानों के रिसर्चर्स भी शामिल हैं।
जैन के लिए, यह सम्मान उन्हें वैज्ञानिकों की उस नई पीढ़ी में शामिल करता है जो चिकित्सा जगत के कुछ सबसे चुनौतीपूर्ण और अनसुलझे सवालों पर काम कर रहे हैं। इसका असर दुनिया भर में क्रोनिक पेन से जूझ रहे लाखों लोगों पर पड़ सकता है।
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