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भारतीय मूल के स्कॉलर ने जीती हार्वर्ड शोध प्रतियोगिता

दुरईसिंह 11 जून को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अपना शोध पेश करेंगे।

 मनोज दुरईसिंह  मनोज दुरईसिंह / Harvard T.H. Chan School of Public Health

भारतीय मूल के स्कॉलर मनोज दुरईसिंह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के 'स्टार-फ्राइडमैन चैलेंज फॉर प्रॉमिसिंग साइंटिफिक रिसर्च' (2026) के विजेताओं में शामिल हैं। हार्वर्ड में इम्यूनोलॉजी और संक्रामक रोगों के 'जॉन लापोर्टे गिवेन प्रोफेसर' दुरईसिंह को उनके साथी रिसर्चर अहमद "मो" खलील के साथ उनके प्रोजेक्ट "इंजीनियरिंग रेड ब्लड सेल्स फॉर डिसीज डिटेक्शन: PATROL-RBCs" के लिए चुना गया।

इस प्रोजेक्ट का मकसद ऐसी इंजीनियर की गई रेड ब्लड सेल्स (लाल रक्त कोशिकाएं) बनाना है जो इंसानी शरीर के अंदर बीमारियों का पता लगा सकें। इससे कई तरह की मेडिकल स्थितियों के निदान और निगरानी के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं।

यह रिसर्च उस तरह के अनोखे और भविष्य की सोच वाले वैज्ञानिक काम का उदाहरण है जिसे 'स्टार-फ्राइडमैन चैलेंज' बढ़ावा देता है। यह चैलेंज ऐसे प्रोजेक्ट्स को सपोर्ट करता है जो रिसर्चर को उनके मौजूदा स्टडी के क्षेत्रों से हटकर नई दिशाओं में ले जाते हैं।

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2013 में पूर्व छात्र जेम्स ए. स्टार के दिए गए फंड से शुरू हुए और बाद में जोशुआ और बेथ फ्राइडमैन के सपोर्ट से आगे बढ़ाए गए इस प्रोग्राम के तहत, उन फैकल्टी सदस्यों को फंडिंग दी जाती है जो बड़े असर वाले नए वैज्ञानिक आइडिया पर काम कर रहे हैं।

दुरईसिंह और खलील उन सात टीमों में शामिल हैं जिन्हें 2026 के अवॉर्ड्स के लिए चुना गया है। विजेता हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में 11 जून को होने वाले 'स्टार-फ्राइडमैन चैलेंज' इवेंट के दौरान अपने प्रस्तावित प्रोजेक्ट्स पेश करेंगे।

संक्रामक रोगों और इम्यूनोलॉजी के जाने-माने एक्सपर्ट दुरईसिंह की रिसर्च 'होस्ट-पैथोजन इंटरैक्शन' (मेज़बान और रोगाणु के बीच आपसी क्रिया) और संक्रामक रोगों, खासकर मलेरिया की बायोलॉजी को समझने पर केंद्रित है। उनके काम ने इस बात को समझने की ग्लोबल कोशिशों में अहम योगदान दिया है कि रोगाणु (पैथोजन) इंसानी कोशिकाओं पर कैसे हमला करते हैं और उनसे कैसे इंटरैक्ट करते हैं।

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