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भारतीयों के नाम क्यों होते हैं सबसे अधिक H-1B वीजा, IAAC ने रखे तीन बड़े तर्क

एड-टेक कंपनी के चेयरमैन गिर्गिस ने X पर लिखा था कि 70 से 75 प्रतिशत H-1B वीजा भारतीयों को मिलते हैं जबकि भारत की वैश्विक शिक्षा रैंकिंग बहुत ऊंची नहीं है।

 IAAC ने भारत के H-1B अप्रूवल पर बात की। IAAC ने भारत के H-1B अप्रूवल पर बात की। / X/@IAACouncil and Pexels

भारतीय-अमेरिकी एडवोकेसी काउंसिल (IAAC) ने H-1B वीजा बहस में भारतीयों को लेकर दिए जा रहे एक तर्क को ‘सबसे आलसी और भ्रामक सोच’ बताया है। यह प्रतिक्रिया हैनी गिर्गिस की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि H-1B वीजा में भारत की हिस्सेदारी प्रतिभा नहीं, बल्कि कम लागत वाली लेबर रणनीति का नतीजा है।

गिर्गिस एक एड-टेक कंपनी के सह-मालिक और चेयरमैन हैं। उन्होंने X पर लिखा था कि 70 से 75 प्रतिशत H-1B वीजा भारतीयों को मिलते हैं जबकि भारत की वैश्विक शिक्षा रैंकिंग बहुत ऊंची नहीं है। उन्होंने इसे लेबर आर्बिट्रेज यानी कम लागत में काम कराने की नीति बताया।

IAAC ने इस दावे को सिरे से खारिज किया। संगठन ने कहा कि यह तर्क तभी सही लग सकता है जब H-1B और ग्रीन कार्ड की पूरी प्रक्रिया को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाए।

IAAC ने बताया कि भारतीयों को ज्यादा H-1B मंजूरी मिलने के तीन अहम कारण हैं जिनका गिर्गिस ने जिक्र नहीं किया। पहला कारण ग्रीन कार्ड पर देश-आधारित सीमा है। इसके चलते भारतीय कर्मचारी 10 से 20 साल तक H-1B पर फंसे रहते हैं। इस दौरान उन्हें बार-बार वीजा रिन्यू कराना पड़ता है। IAAC के मुताबिक 70 प्रतिशत से ज्यादा H-1B मंजूरियां नए लोगों के लिए नहीं, बल्कि पुराने वीजा की रिन्यूअल होती हैं।

दूसरा कारण यह है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा अंग्रेजी-प्रशिक्षित STEM ग्रेजुएट्स तैयार करता है। अमेरिकी कंपनियां उन्हीं टैलेंट पूल से भर्ती करती हैं जो उनकी तकनीकी जरूरतों, भाषा और सिस्टम से मेल खाता है।

IAAC ने कहा कि अगर मामला सिर्फ सस्ती लेबर का होता तो कम वेतन और कमजोर श्रम सुरक्षा वाले देश सबसे आगे होते लेकिन ऐसा नहीं है।

तीसरा और सबसे बड़ा कारण ग्रीन कार्ड बैकलॉग है। IAAC ने बताया कि कई अरब या अफ्रीकी देशों के H-1B धारकों को 2-3 साल में ग्रीन कार्ड मिल जाता है, इसलिए उन्हें बार-बार वीजा रिन्यू नहीं करना पड़ता। वहीं भारतीय H-1B धारकों को औसतन 5 से 6 बार वीजा रिन्यू कराना पड़ता है सिर्फ इसलिए क्योंकि ग्रीन कार्ड में भारी बैकलॉग है।

IAAC ने अंत में कहा कि H-1B बहस में भारतीयों के खिलाफ बोलते समय ग्रीन कार्ड बैकलॉग को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है जबकि यही पूरी समस्या की जड़ है।

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