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जिन संघर्षों का आंकड़ों में जिक्र नहीं

अमेरिका के 775 यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स में से 455 यानी लगभग 60 प्रतिशत अप्रवासियों द्वारा स्थापित किए गए हैं। इनमें भारत सबसे आगे है।

 सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर / AI generated

इस सप्ताह नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी (NFAP) ने एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट को दो तरीकों से पढ़ा जा सकता है एक उपलब्धि की कहानी के रूप में और दूसरा एक ऐसे सवाल के रूप में जिसका जवाब अभी बाकी है। रिपोर्ट के आंकड़े प्रभावशाली हैं।

अमेरिका के 775 यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स में से 455 यानी लगभग 60 प्रतिशत अप्रवासियों द्वारा स्थापित किए गए हैं। इनमें भारत सबसे आगे है। भारतीय मूल के 96 संस्थापकों ने यूनिकॉर्न कंपनियां बनाई हैं। वहीं एक से अधिक यूनिकॉर्न बनाने वाले 15 संस्थापकों में से 6 भारत में जन्मे हैं।

मैंने यह रिपोर्ट सैन होजे में पढ़ी जहां मैं लगभग चार दशकों से रह रहा हूं। यहां उन संस्थापकों के बच्चे अब 20 और 30 की उम्र में हैं जिनकी सफलता का जिक्र रिपोर्ट में किया गया है। कुछ अपनी कंपनियां बना रहे हैं और कुछ नहीं। लेकिन रिपोर्ट उनके बारे में कुछ नहीं कहती।

रिपोर्ट पढ़ते हुए मुझे लगा कि यह एक ऐसा सवाल उठा रही है जिसे उसने सीधे तौर पर पूछा नहीं है। पढ़ने के बाद मेरे सामने तीन महत्वपूर्ण बातें उभरकर आईं।

पहला सबक: संघर्ष वैकल्पिक नहीं था

यह रिपोर्ट प्रतिभा और अवसर की कहानी जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक और कहानी छिपी है व्यक्तित्व निर्माण की। इस सूची में शामिल पहली पीढ़ी के संस्थापक चाहे वे भारत से हों या किसी और देश से, एक ऐसे दौर से गुजरे जिसे रिपोर्ट नाम नहीं देती।

उन्होंने अपना घर छोड़ा। कई वर्षों तक वीजा संबंधी अनिश्चितताओं का सामना किया। ऐसे समाज में अपनी पहचान बनाए रखी जहां भाषा, भोजन, संस्कृति और सोच सब कुछ अलग था। उन्होंने दो दुनियाओं के बीच संतुलन बनाना सीखा। जब वे किसी अमेरिकी निवेशक के सामने अपनी कंपनी का विचार पेश करने बैठे, तब तक उनके भीतर कुछ ऐसा बन चुका था जिसे कोई बिजनेस स्कूल नहीं सिखा सकता।

असल परीक्षा कंपनी बनाना नहीं थी। असल परीक्षा वह सब कुछ था जो उससे पहले हुआ। यात्रा ही उनकी ट्रेनिंग थी। कंपनी तो बाद में आई। हम अक्सर इन संस्थापकों की कहानी को सिर्फ मेहनत, प्रतिभा और अच्छे विचार की कहानी मानते हैं। यह सही है, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा ने उन लोगों को क्या बनाया, जिन्होंने बाद में कंपनियां खड़ी कीं। यात्रा उनकी शिक्षा थी। कंपनी उनका अंतिम प्रोजेक्ट।

दूसरा सबक: सफलता के पीछे एक गहरी क्षमता

रिपोर्ट में बताया गया है कि एक से अधिक यूनिकॉर्न बनाने वाले 15 संस्थापकों में से 6 भारत में जन्मे हैं। एक यूनिकॉर्न बनाना शायद किस्मत हो सकता है। दो यूनिकॉर्न बनाना क्षमता का संकेत है। लेकिन यह क्षमता केवल एक और अच्छा विचार नहीं है। 

मेरे लगभग 40 वर्षों के अनुभव में सफल संस्थापकों की असली ताकत कुछ और होती है अराजक परिस्थितियों में भी खुद को संभालकर रखना। पहली पीढ़ी के अप्रवासी संस्थापकों के पास न तो पास में परिवार था और न ही कोई मजबूत सामाजिक सहारा।

उन्हें यह सीखना पड़ा कि जब बाहर सब कुछ अस्थिर हो तो भीतर कैसे स्थिर रहा जाए। सालों तक ऐसा करने से एक खास तरह का व्यक्तित्व बनता है। जब फंडिंग नहीं मिलती, सह-संस्थापक कंपनी छोड़ देता है या बाजार अचानक बदल जाता है, तब वे परिस्थितियों के साथ टूटते नहीं हैं।

वे संकट के बीच रहते हुए भी उससे पूरी तरह नियंत्रित नहीं होते। शायद यही उन आंकड़ों को समझने का एक तरीका है। यूनिकॉर्न तो सिर्फ दिखाई देने वाला परिणाम है। असल कहानी उन गुणों की है जो कंपनी बनने से बहुत पहले विकसित हो चुके थे। यूनिकॉर्न अंतिम परिणाम है।

संस्थापक का मानसिक संतुलन उसकी शुरुआती वजह। हम अक्सर लचीलापन (Resilience) को व्यक्तित्व का गुण मानते हैं। लेकिन सच्चाई यह हो सकती है कि लचीलापन उन वर्षों का परिणाम है जिनमें व्यक्ति ने बाहरी अस्थिरता के बीच आंतरिक स्थिरता बनाए रखना सीखा।

तीसरा सबक: प्रभाव सिर्फ कंपनियों का नहीं

NFAP की रिपोर्ट के अनुसार अप्रवासियों द्वारा स्थापित प्रत्येक यूनिकॉर्न कंपनी औसतन 833 लोगों को रोजगार देती है। रिपोर्ट इसे आर्थिक प्रभाव कहती है। लेकिन यह केवल आर्थिक प्रभाव नहीं है।

पहली पीढ़ी के संस्थापक ने अपनी यात्रा के दौरान जो आंतरिक स्थिरता विकसित की, उसी के आधार पर उसने अपने आसपास एक कार्य संस्कृति, एक टीम और एक नेटवर्क तैयार किया।

833 नौकरियां सिर्फ कंपनी के बढ़ने का परिणाम नहीं हैं। वे उस संस्थापक का परिणाम हैं जिसके साथ लोग काम करना चाहते हैं। यह उपलब्धि एक अरब डॉलर के मूल्यांकन से भी बड़ी हो सकती है। कंपनी का मूल्यांकन कुछ महीनों में बदल सकता है।

लेकिन एक मजबूत संस्कृति और भरोसे का वातावरण अक्सर कंपनी से भी ज्यादा समय तक टिकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल

इन तीन बातों के बाद एक सवाल सामने आता है। दूसरी पीढ़ी के भारतीय-अमेरिकी युवाओं के साथ क्या होगा? वे क्यूपर्टिनो, फ्रेमोंट या एडिसन जैसे शहरों में बड़े हुए हैं। उन्होंने अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की।

उनके माता-पिता उन्हें पहले से ही सिस्टम समझा सकते थे। उन्हें वीजा खत्म होने की चिंता नहीं करनी पड़ी। उन्हें 12 टाइम जोन दूर बैठे माता-पिता को फोन करके मदद मांगने की मजबूरी नहीं रही। उनके पास लगभग हर वह सुविधा है जो उनके माता-पिता के पास नहीं थी।

लेकिन उनके पास वह एक चीज नहीं है जो उनके माता-पिता के पास थी वह संघर्ष जिसने उन्हें गढ़ा। इसका मतलब यह नहीं कि दूसरी पीढ़ी के सामने चुनौतियां नहीं होंगी। उनकी चुनौतियां अलग हो सकती हैं।

पहचान, उद्देश्य, अपनापन, ध्यान भटकाने वाली चीजें और अत्यधिक सुविधाएं—ये सब उनके लिए उतनी ही बड़ी परीक्षा बन सकती हैं जितनी उनके माता-पिता के लिए प्रवास और अनिश्चितता थी। यह दूसरी पीढ़ी की आलोचना नहीं है।

यह केवल एक वास्तविकता की ओर इशारा है। जिस संघर्ष ने उनके माता-पिता को बनाया, वही संघर्ष उन्हें नहीं बनाएगा। वे कम प्रतिभाशाली नहीं हैं। शायद अधिक प्रतिभाशाली हैं।

वे कम महत्वाकांक्षी नहीं हैं। शायद अधिक महत्वाकांक्षी हैं। लेकिन जो आंतरिक विकास उनके माता-पिता ने मजबूरी में किया, उन्हें वह शायद अपनी इच्छा से करना होगा।

क्या बिना प्रवास के वैसा ही व्यक्तित्व बन सकता है?

यही वह सवाल है जो NFAP की रिपोर्ट अप्रत्यक्ष रूप से पूछती है। क्या वह पीढ़ी जिसने अपना घर नहीं छोड़ा, किसी दूसरे तरीके से वैसी ही परीक्षा पा सकती है? क्या मजबूरी के बजाय अपनी इच्छा से वही आंतरिक मजबूती विकसित की जा सकती है? क्या क्यूपर्टिनो में पला-बढ़ा कोई युवा संस्थापक भी वैसी ही गहराई और स्थिरता विकसित कर सकता है जैसी उसके माता-पिता ने की थी?

इस सवाल का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। दूसरी पीढ़ी के भारतीय-अमेरिकी संस्थापक अभी अपने करियर की शुरुआत कर रहे हैं। कुछ ने अपने संघर्ष खोज लिए हैं बीमारी, नुकसान या जानबूझकर कठिन परिस्थितियों का सामना करके। कुछ अच्छी कंपनियां बना रहे हैं, लेकिन अभी उनमें वह आंतरिक स्थिरता दिखाई नहीं देती जिसने पहली पीढ़ी के कई संस्थापकों को असाधारण बनाया।

निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन एक बात साफ है। रिपोर्ट के आंकड़े उत्साहजनक हैं और उनका जश्न मनाया जाना चाहिए। फिर भी उससे ज्यादा महत्वपूर्ण वह कहानी है जो इन आंकड़ों के पीछे छिपी है। अप्रवासन ने सिर्फ प्रतिभा को एक देश से दूसरे देश तक नहीं पहुंचाया।

इसने लोगों को अनिश्चितता, बदलाव और जिम्मेदारी के जरिए गढ़ा। पहली पीढ़ी का संघर्ष प्रवास था। दूसरी पीढ़ी अपना संघर्ष किसी और रूप में खोजेगी। सवाल यह नहीं है कि उन्हें संघर्ष मिलेगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या वह संघर्ष उन्हें वैसी ही गहराई और चरित्र प्रदान कर पाएगा। इसका उत्तर अभी भविष्य के पास है।

लेखक एक शोधकर्ता, एप्पल यूनिवर्सिटी के पूर्व फेलो और सीईओ कोच हैं।
 

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