सांकेतिक तस्वीर / Xinhua/Wang Heming/IANS
ब्रिटेन के वेस्ट मिडलैंड्स में एक युवा सिख महिला पर धार्मिक घृणा से प्रेरित हमला करने वाले आरोपी को उम्रकैद की सजा दिए जाने के बाद यूके और विदेशों में बसे सिख समुदायों में गहरी चिंता फैल गई है। 28 अप्रैल को आई एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
खालसा वॉक्स की रिपोर्ट के अनुसार बर्मिंघम क्राउन कोर्ट ने जॉन ऐशबी को उम्रकैद की सजा सुनाई जिसमें कम से कम 21 साल जेल में बिताने होंगे। उस पर अक्टूबर 2025 में वेस्ट मिडलैंड्स के वालसॉल स्थित उसके घर पर 20 वर्ष की उम्र की एक महिला पर हमला करने का दोष साबित हुआ। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि हमले से पहले आरोपी ने महिला का सार्वजनिक परिवहन से उसके घर तक पीछा किया था।
रिपोर्ट के अनुसार इस घटना ने सिख समुदाय को सबसे ज्यादा इसलिए झकझोर दिया क्योंकि अपराध की प्रकृति बेहद चिंताजनक थी। अभियोजकों ने बताया कि ऐशबी ने महिला के पहनावे और रूप-रंग के आधार पर गलत तरीके से यह मान लिया था कि वह मुस्लिम है और हमले के दौरान उस पर इस्लाम विरोधी गालियां दीं।
पीड़िता ने पुलिस को दिए अपने बयान में बताया कि उसने उसे समझाने की कोशिश की थी कि वह मुस्लिम नहीं बल्कि सिख है। रिपोर्ट में कहा गया कि इस घटना ने इस बात पर ध्यान खींचा है कि पहचान के दिखने वाले संकेत जैसे पहनावा या त्वचा का रंग सिख महिलाओं को नफरत से प्रेरित हिंसा का आसान निशाना बना सकते हैं।
सिख वुमेन ऐड ने कहा कि इस घटना का भावनात्मक असर बहुत व्यापक है। समुदाय के नेताओं का कहना है कि इस मामले ने सिख महिलाओं की सुरक्षा की भावना को गहराई से हिला दिया है क्योंकि बहुत-सी महिलाएं खुद को पीड़िता की जगह रखकर देख रही हैं। उनको अकेले सफर करना, काम से घर लौटना और सार्वजनिक स्थानों पर चलना अब आसान नहीं लग रहा है।
संगठन की ट्रस्टी चेयर सुखविंदर कौर ने कहा कि स्थानीय लोगों से बातचीत में डर और चिंता साफ दिखाई दी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक घटना नहीं है। यह अनगिनत महिलाओं के अनुभव से जुड़ती है जो अब यह सोचने लगी हैं कि क्या वे अपने ही घर में सुरक्षित हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि इस घटना ने सिख प्रवासी समुदाय के भीतर गलत पहचान और धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को निशाना बनाया जाना को लेकर एक और बड़ी चिंता को सामने लाया है। समुदाय के नेताओं ने लंबे समय से चेतावनी दी है कि सिख अज्ञानता के कारण भेदभाव और हमलों का शिकार बन सकते हैं।
रिपोर्ट में सामुदायिक कार्यकर्ताओं का हवाला देते हुए कहा गया कि केवल पुलिस व्यवस्था काफी नहीं है। रूढ़ियों को तोड़ने और नफरत से प्रेरित हिंसा को रोकने के लिए शिक्षा, जागरूकता, मजबूत सामुदायिक भागीदारी और पूर्वाग्रह के खिलाफ एकजुट रुख जरूरी है। रिपोर्ट ने अंत में कहा कि यह मामला एक कड़ी याद दिलाता है कि अल्पसंख्यक महिलाओं को किन खतरों का सामना करना पड़ता है और यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि किसी की धार्मिक या अन्य पहचान डर का कारण न बने।
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