प्रतीकात्मक / PoK
पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) लगातार हुक्मरानों और सुरक्षा बलों की बर्बरता का शिकार हो रहा है। इन दिनों तनाव चरम पर है। इस बीच मीडिया की आवाज उठाने वाले स्वतंत्र पत्रकार संगठन ने कब्जे वाले इस क्षेत्र में मीडिया कर्मियों की बिगड़ती स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। संगठन ने इंटरनेट ब्लैकआउट, दूरसंचार सेवाओं पर रोक, रिपोर्टिंग पर पाबंदी और पत्रकारों को हिरासत में लेने या उन्हें अगवा करने जैसी घटनाओं की ओर ध्यान दिलाया है।
प्रेस स्वतंत्रता संगठन 'कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स' (सीपीजे) ने पाकिस्तानी अधिकारियों से पत्रकारों पर कार्रवाई तुरंत बंद करने, सूचना तक पहुंच बहाल करने और पीओके में स्वतंत्र रिपोर्टिंग की अनुमति देने की मांग की।
सीपीजे ने पीओके में पत्रकारों पर जारी कार्रवाई को उजागर करते हुए कहा, “स्वतंत्र कश्मीरी पत्रकार सैयद फरहाद अली शाह विरोध प्रदर्शनों की कवरेज के कारण अभी भी हिरासत में हैं। 28 जुलाई को बाघ जिले में भूख हड़ताल शुरू करने के बाद से उनकी स्थिति को लेकर कोई जानकारी नहीं मिली है। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें तत्काल चिकित्सा सुविधा मिले और उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।”
सीपीजे ने आगे कहा, “पत्रकार रजी ताहिर और मुहम्मद सैफ 1 अगस्त को कथित तौर पर पुलिस वर्दी में आए लोगों द्वारा ले जाए जाने के बाद से लापता हैं। यदि वे सरकारी हिरासत में हैं तो पाकिस्तानी अधिकारियों को इसकी जानकारी देनी चाहिए, उचित कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित करनी चाहिए और उन्हें तुरंत रिहा करना चाहिए।”
संगठन ने कई सोशल मीडिया यूजर्स के दावों का भी हवाला दिया कि पीओके से 1 अगस्त को रिपोर्टिंग के बाद पाकिस्तान में कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रसारकों की वेबसाइटों को प्रतिबंधित कर दिया गया है।
पाकिस्तान में कई यूजर्स ने अल जजीरा को एक्सेस न कर पाने की शिकायत की है। सीपीजे ने प्रेस स्वतंत्रता, इंटरनेट प्रतिबंधों और स्वतंत्र जानकारी जनता को मुहैया कराने के अधिकार पर बैन को लेकर चिंता जताई। रिपोर्ट के मुताबिक, पीओके में 5 जून से "आंशिक इंटरनेट ब्लैकआउट और दूरसंचार पर प्रतिबंध" लागू हैं।
पीओके अशांत है। रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तानी बलों की बर्बर कार्रवाई में पिछले कुछ दिनों में 50 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं। असल संख्या इससे कहीं ज्यादा होने की आशंका है।अंतरराष्ट्रीय मीडिया वेबसाइट्स पर लगाए गए कथित बैन, इंटरनेट और मीडिया कवरेज को लेकर चिंताओं ने राजनीतिक अस्थिरता के दौरान पारदर्शिता, प्रेस स्वतंत्रता और स्वतंत्र सूचना के प्रवाह को लेकर बहस तेज कर दी है।
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